सीकर। आचार्य वर्धमान सागर जी के सान्निध्य में चल रही संयम साधना, दर्शन को श्रद्धालु उमड़ रहे हैं।
दिन रात मेरे स्वामी मैं भावना ये भाऊं।
देहांत के समय में तुमको न भूल जाऊं।।
शत्रु अगर कोई हो संतुष्ट उनको कर दूँ। समता का भाव धरकर सबसे क्षमा कराऊँ ।। त्यागू आहार पानी औषध विचार अवसर। टूटे नियम न कोई दृढ़ता हृदय में लाऊँ ॥ जागे नहीं कषायें नहीं वेदना सतावें। तुमसे ही लौ लगी हो दुर्ध्यान को भगाऊँ ॥ आतम स्वरूप अथवा आराधना विचारूँ। अरहंत सिद्ध साधु रटना यहीं लगाऊँ ॥ धरमात्मा निकट हों चरचा धरम सुनावें। वह सावधान रक्खे गाफिल न होने पाऊँ ।। जीने की हो न वांछा मरने की हो न इच्छा। परिवार मित्रजन से मैं राग को हटाऊं ॥ भोग जो भोगे पहले उनका न होवे सुमरन । मैं राज्य संपदा या पद इन्द्र का न चाहूँ । जैन दर्शन में समाधि की उत्कृष्ट भावना मनुष्य जीवन में बिरले पुण्यशाली ही कर पाते हैं। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज के संघ सान्निध्य में इन दिनों 4 साधुओं द्वारा संयम समाधि संलेखना की तैयारी चल रही है। मुनि श्री प्रभाष सागर जी महाराज दो उपवास के बाद आहार में सभी अनाज का त्याग कर मात्र दो रस और सीमित फल ले रहे हैं। वहीं आर्यिका श्री जिनेशमति माताजी ने चारों प्रकार के आहार का त्याग कर यम संलेखना धारण की है, 3 नवंबर नवमी को उनका आठवां उपवास है। आर्यिका श्री सुदृष्टिमति माताजी ने भी सभी अनाज और सभी 6 रसों का त्याग कर दिया है। वे आहार में दो दिन छोड़कर मात्र सेब, मुनक्का, पानी और जल ही ले रही हैं। नवीन क्षुल्लिका माताजी की भी संयम साधना चल रही है। दिनभर सीकर ही नहीं अन्य नगरों से परिजन और समाजजन दर्शन के लिए आ रहे हैं।
क्षपक साधु के दर्शन, सेवा और आहार दान तीर्थ यात्रा से कम नहीं
डॉ. राजेश पंचोलिया के अनुसार आचार्य श्री वर्धमान सागर जी, मुनि श्री हितेंद्र सागर जी एवं संघ के साधुओं द्वारा चारों साधुओं को निरंतर संबोधन कर सजग रहने की प्रेरणा दी जा रही है। आचार्य श्री ने उपदेश में बताया कि समाधि वाले क्षपक साधु की उत्कृष्ट समाधि होने पर न्यूनतम 2 भव और अधिकतम अगले 8 भव में सिद्धालय की प्राप्ति होती है। इसलिए क्षपक साधु के दर्शन, सेवा और आहार दान तीर्थ यात्रा से कम नहीं है।




