डडूका/बांसवाड़ा। विश्व धर्म प्रभाकर वैज्ञानिक धर्माचार्य आचार्य श्री कनकनंदी गुरुदेव की अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में मुनि श्री सुविज्ञसागर महाराज ने आचार्यश्री की कविता—“शत-शत वंदन है समभाव, शत-शत वंदन है निजभाव, वंदना तुझको बारंबार, शत-शत वंदन है शुद्धभाव”—का विशेष विवेचन किया।
शुद्धभाव है निर्विकार आत्मस्वरूप
मुनि श्री ने कहा कि कविता में समभाव, निजभाव और शुद्धभाव को बार-बार नमन किया गया है। शुद्धभाव का स्वरूप निर्विकार, संकल्प-विकल्प से रहित तथा राग, द्वेष और मोह से मुक्त बताया गया है। आत्मा का स्वरूप अचल, अविचल और चिदानंदमय है।
साधना का लक्ष्य है साम्यभाव
उन्होंने कहा कि व्रत, नियम, ध्यान, अध्ययन, मनन और चिंतन का उद्देश्य साम्यभाव की प्राप्ति है। जैन परंपरा में क्षमा, मार्दव, आर्जव, सत्य, शौच, संयम, तप, त्याग, ब्रह्मचर्य, आकिंचन्य, धैर्य और गुप्ति जैसे धर्मों का पालन भी आत्मा में समता विकसित करने के लिए किया जाता है।
लाभ-अलाभ में बनी रहे समता
मुनि श्री ने कहा कि समभाव की स्थिति में लाभ-अलाभ, मान-अपमान, हर्ष-विषाद तथा शत्रु-मित्र के प्रति आसक्ति या द्वेष नहीं रहता। धन, ख्याति, पूजा और सम्मान मिलने पर भी मोह उत्पन्न न हो, यही साधक की आंतरिक स्थिरता है। आत्मा को अजर-अमर मानते हुए जन्म और मरण के प्रति भी सम्यक दृष्टि विकसित होती है।
त्याग से मिलता है समभाव का साम्राज्य
उन्होंने बताया कि साम्यभाव की उपलब्धि के लिए चक्रवर्ती भी राज्य और वैभव का त्याग करते हैं। समभाव का साम्राज्य सभी बाहरी उपलब्धियों से श्रेष्ठ है। इसी के माध्यम से आत्मशांति, सुख और मोक्षमार्ग की दिशा प्रशस्त होती है।
कार्यक्रम की जानकारी विजयलक्ष्मी गोदावत, सागवाड़ा एवं अजीत कोठिया, डडूका ने दी।
श्रीफल साथी : अजीत कोठिया, डडूका




