कोटा। वात्सल्य को बताया धर्म का जीवंत स्वरूप श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में चातुर्मास प्रवचनमाला के दौरान परम पूज्य आचार्य भगवन श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य, ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ससंघ के सान्निध्य में धर्म और अध्यात्म की ज्ञानधारा प्रवाहित हो रही है।
धर्मसभा में मुनिश्री ने आचार्य समन्तभद्र स्वामी रचित ‘रत्नकरण्ड श्रावकाचार’ के वात्सल्य अंग का भावपूर्ण एवं व्यावहारिक विवेचन किया। उन्होंने कहा कि सहधर्मी के प्रति निष्कपट प्रेम, सम्मान और सहयोग ही वात्सल्य है।
निष्कपट आत्मीयता ही सच्चा वात्सल्य
मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने कहा कि वात्सल्य का अर्थ सहधर्मियों के प्रति छल-कपट से रहित सद्भावना, प्रेम, आत्मीयता तथा यथायोग्य विनय और भक्ति का भाव रखना है। धर्म केवल पूजा-पाठ और धार्मिक क्रियाओं तक सीमित नहीं, बल्कि उसका वास्तविक स्वरूप हमारे व्यवहार में दिखाई देता है।
जब हम किसी साधर्मी के सुख-दुःख में उसके साथ खड़े होते हैं, उसकी सफलता में प्रसन्न होते हैं और कठिन समय में उसका सहारा बनते हैं, तभी वात्सल्य का वास्तविक प्राकट्य होता है।
गुणों को देखें, मतभेदों को नहीं
मुनिश्री ने कहा कि समाज में छोटी-छोटी बातों से मनमुटाव, अहंकार और दूरियां उत्पन्न हो जाती हैं। ऐसे समय में वात्सल्य हमें व्यक्ति के दोषों के बजाय उसके गुणों को देखने तथा मतभेदों को प्रेम और संवाद से दूर करने की प्रेरणा देता है।
सहधर्मी के प्रति ईर्ष्या के स्थान पर उसके गुणों को देखकर प्रसन्न होना धर्म की वास्तविक सुंदरता है। जिस समाज में प्रेम, सम्मान, सहयोग और वात्सल्य होता है, वह समाज संगठित होकर धर्मप्रभावना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
स्वार्थरहित प्रेम ही वात्सल्य की पहचान
मुनि श्री ने कहा कि किसी से इसलिए प्रेम न करें कि वह हमारे लिए कुछ करता है, बल्कि इसलिए करें कि वह भी हमारी तरह धर्ममार्ग का पथिक है। प्रेम में स्वार्थ नहीं, अपनत्व होना चाहिए और व्यवहार में दिखावा नहीं, निष्कपटता होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि निंदा के स्थान पर गुणानुवाद, विरोध के स्थान पर सहयोग और दूरी के स्थान पर आत्मीयता अपनाने से अनेक विवाद स्वतः समाप्त हो सकते हैं।
धर्मसभा में श्रद्धालुओं की सहभागिता
धर्मसभा में बाहर से आए श्रद्धालुओं ने मुनि श्री योगसागर जी महाराज के श्रीचरणों में श्रीफल अर्पित कर मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। चातुर्मास स्वागत समिति द्वारा अतिथियों एवं श्रद्धालुओं का आत्मीय स्वागत किया गया।
श्रद्धालुओं ने पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण, जिनवाणी वंदना एवं विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में सहभागिता कर धर्मलाभ अर्जित किया। मंदिर परिसर णमोकार महामंत्र, गुरुभक्ति और जिनवाणी के मंगलमय स्वरों से गुंजायमान रहा।
विभिन्न परिवारों ने अर्जित किया पुण्यार्जन
प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि शांतिधारा का पुण्यार्जन श्री भुमेन्द्र जी, श्रीमती शकुन्तला जी, श्री नामोकर जी एवं जैन परिवार, तलवंडी, कोटा; श्री हुकमचंद सोगानी परिवार तथा श्रीमती सुशीला जी एवं श्री विवेक ठोरा परिवार द्वारा प्राप्त किया गया।
श्री हुकम जी, एडवोकेट ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन श्री भुमेन्द्र जी, श्रीमती शकुन्तला जी, श्रीमती अल्का जी, श्री नामोकर जी एवं समस्त जैन परिवार, तलवंडी, कोटा द्वारा किया गया।
श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान का पुण्यार्जन श्री पुण्योदय भक्तामर मंडल परिवार ने प्राप्त किया। उपाध्यक्ष श्री सुमित जैन एवं श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि क्षुल्लक श्री संयमसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य श्री विमल जी, श्री योगेश जी, श्रीमती सोना जी एवं श्री प्रशम सेठिया, हरिगढ़ वाले परिवार को प्राप्त हुआ मंगलाचरण का पुण्य अवसर श्रीमती हर्षा कोटिया द्वारा सम्पन्न किया गया।
गुरुवाणी का अमृत संदेश
मुनि श्री योगसागर जी महाराज का संदेश रहा कि सहधर्मी के प्रति निष्कपट प्रेम, सम्मान और सहयोग ही वात्सल्य है। वात्सल्य की भावना से धर्म समाज में जीवंत, प्रभावशाली और आत्मीय बनता है। धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने आचार्यश्री की पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण एवं जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।



