इंदौर। दसलक्षण पर्व के दौरान छत्रपति नगर दलाल बाग में 33 वें श्रावक संस्कार शिविर में निर्यापक मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने पहले दिन उत्तम क्षमा धर्म के बारे में विस्तार से श्रावकों को अद्भुत ज्ञान सौंपा। धर्मसभा में दसलक्षण महापर्व में मुनिश्री ने श्रावकों को दस धर्मों में से पहले उत्तम क्षमा धर्म के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि उत्तम क्षमा वह धर्म है, जिसमें मन में मैल न हो। द्वेष न हो। अभिमान न हो। उत्तम क्षमा को अपनाएंगे तो आपका मन निर्मल हो जाएगा। प्राण भी निर्मल हो जाएगा। मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने इस अवसर पर क्रोध के प्रकार भी बताए। उन्होंने कहा कि कभी भी अपने से कमजोर पर क्रोध नहीं करना चाहिए। यदि कमजोर पर क्रोध करेंगे तो इसकी भयानक यातना भोगनी पड़ेगी। मुनिश्री ने एक राजा की कहानी के माध्यम से समझाया कि उनके राजप्रसाद का रसोइया बहुत ही स्वादिष्ट भोजन बनाता था। वे राजा चक्रवर्ती थे। एक दिन किसी कारण से रसोई में भोजन का स्वाद थोड़ा बिगड़ गया। राजा को क्रोध आ गया और उन्होंने रसोइयों को लात मारी। वह एक ही लात में मर गया। अगले भव में वह फिर रसोइया बना। उसने राजा को सुस्वादु फल लाकर दिए। राजा ने कहा कि यह फल कहां से लेकर आए तो रसोइये ने कहा- जहां से मैं लेकर आया हूं वहां आप नहीं जा सकते। राजा जिद पर अड़ गया। उसने कहा- हम वहां जरूर जाना पसंद करेंगे। रसोइया बोला- आप वहां अपनी सारी शक्तियां, अस्त्र आदि यहीं छोड़कर जा सकते हैं। राजा तैयार हो गया। वह राजा को वहां ले गया, जहां से वह फल लेकर आता था। उसने राजा से कहा- अब तुम मेरे हाथों से मारे जाओगे क्योंकि तुमने मुझे लात मारी थी। उसने राजा को जहरीले फल दिए। राजा णमोकार मंत्र का जाप करने लगा, लेकिन रसोइये ने उसे रोक दिया। अंततः राजा का प्राणांत हो गया। इसलिए कहा गया है कि कभी कमजोर पर क्रोध नहीं करना चाहिए। उससे कोई गलती हो जाए तो उसे माफ कर देना चाहिए।

अपने से शक्तिशाली पर क्रोध न करें

महाराज श्री ने आगे प्रवचन में कहा- कभी भी अपने से शक्तिशाली पर भी क्रोध नहीं करना चाहिए, क्योंकि शक्ति संपन्न व्यक्ति हमें नुकसान पहुंचा सकता है। मुनिश्री ने कहा कि मथुरा के राजा कंस अपनी बहन देवकी से बहुत प्यार करता था। उसके विवाह के उपरांत उसे विदा करने स्वयं रथ पर लेकर गया। साथ में उसका जमाता वसुदेव भी था। रास्ते में भविष्यवाणी हुई कि देवकी का पुत्र ही तेरे विनाश का कारण बनेगा। बस बात बिगड़ गई और उसने क्रोध में आकर उन्हें जेल में डाल दिया। आखिर उसका भी विनाश हुआ। गुरुदेव ने कहा कि कभी भी अपने पूज्य, गुरु, माता-पिता और वरिष्ठजनों पर भी क्रोध नहीं करना चाहिए।

रामायण के प्रसंग से समझाया उत्तम क्षमा का महत्व

मुनिश्री ने रामायण का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि भगवान राम का राज्याभिषेक होने जा रहा था। उनकी माता कैकेयी ने उन्हें वनवास जाने का आदेश दे दिया। इस पर लक्ष्मण को बड़ा क्रोध आया, लेकिन राम ने कहा- माता पूज्य हैं, मैंने उनकी चरण वंदना की है। इसलिए क्रोध न करें। वे वन जाने से पहले कैकेयी से मिलने गए और चरण वंदन किया। इस पर लक्ष्मण को क्रोध आया और कहा कि माता कौशल्या वहां इंतजार कर रही है और आप जिन्होंने वनवास दिया उनकी चरण वंदना कर रहे है। इस पर राम ने कहा-वह माता हैं, पूज्य हैं। इसलिए लक्ष्मण क्रोध को त्याग दो। राम के इसी चरित्र और उत्तम क्षमा के गुण के कारण विश्व में सर्वाधिक ग्रंथों की रचना हुई। वे सभी धर्म और संप्रदायों में प्रथम पूज्य भी हुए। इसलिए उत्तम क्षमा ही मनुष्य कुल को प्रथम बना सकता है। उन्होंने भगवान पार्श्वनाथ का प्रसंग सुनाकर भी उत्तम क्षमा धर्म का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि इसी उत्तम क्षमा धर्म के कारण भगवान पार्श्वनाथ 23वें तीर्थंकर होने के बाद भी सर्वाधिक पूजनीय हुए। सबसे अधिक जिनालय उनके हैं।

श्रावकों को दिलवाए नियम

मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने 33वें शिविर में देशभर से आए बड़ी संख्या में श्रावकों को नियम दिलवाए। उन्होंने मौन रहने, पांडाल छोड़कर नहीं जाने, मोबाइल टीवी और समाचार पत्र का त्याग करने, भोजन के समय मौन धारण करने समेत कई नियम दिलवाए। साथ ही करीब 300 श्रावकों ने पहले दिन उपवास का नियम लिया।

श्रावक संस्कार शिविर से पहले हुआ ध्वजारोहण

श्रावक संस्कार शिविर का आरंभ विधिवत ध्वजारोहण किया गया। इस अवसर पर मुनिश्री सुधासागरजी का भी सानिध्य मिला। इससे पूर्व भगवान का अभिषेक, शांतिधारा करने के लिए देशभर से आए श्रावकों ने इसमें भाग लिया। श्रावकों ने पारंपरिक सोला धारण कर शिविर में भाग लिया। प्रवचन में भी सभी सोला धारण कर ही भाग लिया। संचालन अनुराग जैन ने किया। धर्मसभा पांडाल में दोपहर डेढ़ बजे से पुनः श्रावकों को महाराज श्री का उद्बोधन सुनने का अवसर प्राप्त हुआ।

कार्यक्रम में यह समाज श्रेष्ठीजन मौजूद रहे

धर्मसभा में बुधवार को चक्रवर्ती मनीष सपना गोधा, आनंद गोधा, नवीन गोधा, हर्ष जैन, प्रिंसपाल टोंग्या, आकाश जैन कोयला परिवार समेत बड़ी संख्या में श्रावक गण मौजूद रहे।