इंदौर। भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के इंडियन नॉलेज सिस्टम्स (आईकेएस) डिवीजन द्वारा विकसित ऑनलाइन प्राकृत सर्टिफिकेट कोर्स का शुभारंभ गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर परम पूज्य मुनिश्री 108 सुनीलसागर जी महाराज के विशाल धर्मसंघ के सान्निध्य में नेमीनगर, इंदौर में आईकेएस के नेशनल कोऑर्डिनेटर प्रो. जी. एस. मूर्ति द्वारा किया गया। कार्यक्रम में प्राकृत भाषा के संरक्षण, संवर्धन और भारतीय ज्ञान परंपरा से उसके संबंध पर विशेष प्रकाश डाला गया।

प्राकृत अध्ययन की आवश्यकता पर जोर

देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर स्थित आईकेएस सेंटर इन जैना मैथेमेटिक्स के मुख्य अन्वेषक प्रो. अनुपम जैन ने कहा कि जैन संस्कृति और भारतीय ज्ञान परंपरा को समग्र रूप से समझने के लिए प्राकृत भाषा का ज्ञान आवश्यक है। उन्होंने बताया कि इसी उद्देश्य से इस ऑनलाइन पाठ्यक्रम की संकल्पना तैयार की गई है।

छह माह का निःशुल्क ऑनलाइन पाठ्यक्रम

कोर्स के संयोजक डॉ. पारस जैन ने बताया कि छह माह की अवधि वाले इस पाठ्यक्रम में सप्ताह में तीन दिन ऑनलाइन कक्षाएं होंगी। देशभर के विषय विशेषज्ञ विद्यार्थियों को अध्यापन कराएंगे तथा प्रत्येक माह विशेष व्याख्यान भी आयोजित किए जाएंगे। आधुनिक तकनीक के माध्यम से इसे राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संचालित किया जाएगा।

गुरु पूर्णिमा पर हुआ शुभारंभ

प्रो. जी. एस. मूर्ति ने अपने उद्बोधन में कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण और प्रसार में गुरुओं की भूमिका सर्वोपरि है। गुरु पूर्णिमा पर इस पाठ्यक्रम का शुभारंभ उसी परंपरा का प्रतीक है। उन्होंने समाज से निःशुल्क एवं गुणवत्तापूर्ण पाठ्यक्रम का लाभ लेने का आग्रह करते हुए पोस्टर पर उपलब्ध क्यूआर कोड के माध्यम से पंजीयन करने की अपील की।

प्राकृत ने अनेक भाषाओं को किया समृद्ध

पूज्य आचार्य श्री ने प्राकृत भाषा के मंगलाचरण के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए कहा कि प्राकृत ने भारत की अनेक भाषाओं को समृद्ध किया है। उन्होंने कहा कि हिन्दी की जड़ें भी प्राकृत में हैं तथा भारतीय ज्ञान परंपरा और प्राचीन साहित्य को सही रूप में समझने के लिए प्राकृत का अध्ययन अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने इस पहल के लिए पूरी टीम को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।

जैन गणित संदर्भ ग्रंथ की भेंट

कार्यक्रम में प्रो. जी. एस. मूर्ति ने अपने विभाग द्वारा प्रकाशित ‘जैन गणित संदर्भ ग्रंथ’ की प्रति पूज्य आचार्य श्री को भेंट की। आचार्य श्री ने ग्रंथ के लेखक प्रो. अनुपम जैन एवं प्रकाशकों को शुभाशीष देते हुए ‘प्राकृत साहित्य में गणित’ विषयक कृति के सृजन की प्रेरणा भी प्रदान की। इस अवसर पर शासन स्तर से प्रकाशन के लिए अग्रिम सहमति मिलने की जानकारी भी साझा की गई।

देशभर से मिल रहाआ उत्साहजनक प्रतिसाद

प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार समाचार लिखे जाने तक कश्मीर से कन्याकुमारी तक 200 से अधिक शिक्षक एवं शोधार्थी इस ऑनलाइन प्राकृत सर्टिफिकेट कोर्स में पंजीयन करा चुके हैं। यह संख्या प्राकृत भाषा के प्रति बढ़ती रुचि और इस अभिनव पहल की सफलता का स्पष्ट संकेत मानी जा रही है।