दिल्ली । ऋषभोदय में विराजित दिगंबर जैन पट्टाचार्य 108 श्री विशुद्धसागर जी महामुनिराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि व्यक्ति को निरंतर अपने गुणों की वृद्धि करनी चाहिए और दोषों को छोड़ने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने कहा कि स्वयं को प्रभावी बनाओ, लेकिन किसी का तिरस्कार मत करो। प्रभावी बनो, पर प्रभाव मत दिखाओ। आपकी सरलता ही आपकी पहचान बने। प्रभाव चाहने से नहीं, बल्कि गुणों की वृद्धि से उत्पन्न होता है। जब गुण वर्धमान होंगे तो प्रभाव स्वतः फैल जाएगा।

ढोंग छोड़ो, ढंग से जियो

महाराजश्री ने कहा कि जीवन में दिखावा व्यक्ति को भीतर से कमजोर करता है। झूठे प्रदर्शन के कारण व्यक्ति अपने जीवन की वास्तविक शांति खो देता है। यदि आत्मशांति, आत्मसुख और आत्मोत्कर्ष की इच्छा है तो ढोंग छोड़कर सहज और सही ढंग से जीवन जीना प्रारंभ करना चाहिए।

निर्मल मन से निर्मल चरित्र

उन्होंने कहा कि जिसका मन सच्चा और चित्त निर्मल होगा, वही अपने चारित्र को निर्मल बना सकता है। मन की पवित्रता ही व्यक्ति के जीवन में वास्तविक परिवर्तन का आधार बनती है। बाहरी प्रदर्शन के बजाय भीतर की शुद्धता पर ध्यान देना आवश्यक है।

साहित्य संस्कृति का संवाहक

पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज ने कहा कि साधना, साहित्य और साधु के माध्यम से संस्कृति की रक्षा संभव है। साहित्य संस्कृति का संवाहक होता है। यदि संस्कार, संस्कृति, संत और समाज की रक्षा करनी है तो साहित्य की रक्षा भी उतनी ही आवश्यक है।

सरलता बने जीवन की पहचान

धर्मसभा में दिए गए संदेश का केंद्र सहजता, सरलता और आत्मशुद्धि रहा। महाराजश्री ने समाजजनों को बाहरी प्रभाव और दिखावे के बजाय अपने गुणों, संस्कारों और आचरण को मजबूत करने की प्रेरणा दी।