कलिंजरा। आध्यात्मिक वर्षायोग 2026 के अंतर्गत मंगल प्रवचन में आर्यिका 105 सिद्ध श्री माताजी ने छहढाला की पांचवीं ढाल के माध्यम से जीवन की अनित्यता और जीव की वास्तविक शरण के विषय पर श्रद्धालुओं का मार्गदर्शन किया।

संसार अनित्य, आत्मा शाश्वत

माताजी ने कहा कि संसार की सभी वस्तुएं अनित्य हैं, जबकि आत्मा शाश्वत है। शरीर और पुद्गल निरंतर परिवर्तनशील हैं, लेकिन आत्मा के स्वभाव में परिवर्तन नहीं होता। कर्मों के संपर्क के कारण जीव अपने वास्तविक स्वरूप को भूलकर संसार में भटक रहा है।

भौतिक साधन मृत्यु नहीं रोक सकते

पंडित दौलतराम जी की पंक्ति, “मणि मंत्र तंत्र बहु होई, मरते न बचावे कोई” का भावार्थ समझाते हुए माताजी ने कहा कि चिंतामणि, कल्पवृक्ष, कामधेनु, धन-संपत्ति और राजपाट मनुष्य को भौतिक सुख दे सकते हैं, लेकिन मृत्यु के समय एक सांस भी नहीं बढ़ा सकते। आयु कर्म समाप्त होने पर कोई व्यक्ति या साधन जीव को मृत्यु से नहीं बचा सकता।

अंतिम शरण कौन?

माताजी ने कहा कि मां-बेटा, परिवार, मित्र और धन जीवन में कुछ समय तक सहयोगी हो सकते हैं, लेकिन अंतिम समय में कोई किसी की शरण नहीं बन सकता। पंच परमेष्ठी भगवान और रत्नत्रय रूप धर्म ही जीव की वास्तविक शरण हैं।

आत्मकल्याण का पुरुषार्थ

उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि संसार के क्षणिक सहारों के पीछे भटकने के बजाय आत्मकल्याण, प्रभु-स्मरण और कर्मनिर्जरा का पुरुषार्थ करें। राग का त्याग कर आत्मस्वरूप की शरण में जाने का प्रयास ही जीवन का वास्तविक उद्देश्य है।