मुरैना। नगर के श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में विराजमान आचार्य श्री उदारसागर महाराज ने रत्नकरण्ड श्रावकाचार ग्रंथ के स्वाध्याय के दौरान सम्यक दर्शन के आठ अंगों का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि सम्यक दर्शन मोक्ष मार्ग की आधारशिला है और इसके सभी आठों अंगों का सम्यक रूप से पालन आवश्यक है। इनमें से किसी एक अंग में भी कमी रह जाने पर मोक्षमार्ग की साधना पूर्णता को प्राप्त नहीं कर सकती। आचार्यश्री ने कहा कि धर्म के मार्ग पर केवल श्रद्धा रखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि सही श्रद्धा के साथ सम्यक ज्ञान और सम्यक आचरण भी आवश्यक है। सम्यक दर्शन के आठों अंग जीव की आध्यात्मिक यात्रा को पूर्णता प्रदान करते हैं। इनमें किसी प्रकार की कमी रहने पर जीव के लिए संसार की परंपरा को तोड़कर मोक्षमार्ग पर आगे बढ़ना कठिन हो जाता है। उन्होंने इसे सरल उदाहरण के माध्यम से समझाते हुए कहा कि यदि किसी व्यक्ति को सर्प ने काट लिया हो और उसके विष को निकालने के लिए जिस मंत्र का प्रयोग किया जा रहा है, उसमें एक अक्षर भी कम हो जाए तो मंत्र अपना अपेक्षित प्रभाव नहीं दिखा सकता। इसी प्रकार मोक्षमार्ग में किसी आवश्यक अंग की कमी साधना की पूर्णता में बाधक बन सकती है।

आध्यात्मिक साधना में छोटी कमी को भी सामान्य नहीं समझें

आचार्यश्री ने धरसेन महाराज से संबंधित प्रसंग सुनाते हुए बताया कि दो आगंतुक मुनिराजों को धरसेन महाराज ने एक मंत्र दिया और उसे गिरनार पर्वत पर सिद्ध करने के लिए कहा। दोनों मुनिराजों ने साधना कर मंत्र को सिद्ध किया, लेकिन बाद में उन्हें ज्ञात हुआ कि मंत्र में एक अक्षर कम था। उन्होंने धरसेन महाराज को इसकी जानकारी दी। इस प्रसंग के माध्यम से आचार्यश्री ने धर्म में शुद्धता, पूर्णता और सावधानी का महत्व बताया। उन्होंने कहा कि आध्यात्मिक साधना में छोटी-सी कमी को भी सामान्य नहीं समझना चाहिए। सम्यक दर्शन के सभी अंगों को समझकर, स्वीकार कर जीवन में उतारना आवश्यक है। यही जीव को संसार के बंधनों से मुक्त होकर आत्मकल्याण और मोक्ष की दिशा में आगे बढ़ाने वाला मार्ग है।

मनुष्य जन्म आत्मकल्याण और मोक्ष साधना के लिए मिलाः

मुनि श्री 108 उपशांतसागरजी महाराज ने प्रवचन में कहा कि मनुष्य जन्म केवल भोग-विलास के लिए नहीं, बल्कि आत्मकल्याण और मोक्ष की साधना के लिए मिला है। मनुष्य जन्म की वास्तविक सार्थकता तभी है, जब जीव संयम के मार्ग पर चलकर अपने जीवन को धर्ममय बनाए। जिन जीवों के पुण्य का उदय होता है, उन्हें धर्म के प्रति अनुराग, साधु-संतों का सान्निध्य और जिनेन्द्र भगवान की भक्ति जैसे श्रेष्ठ अवसर प्राप्त होते हैं।

जिनेन्द्र भगवान का अभिषेक करते समय शुद्ध वस्त्र धारण करें

मुनिश्री ने कहा कि पुण्य का उदय जीवन में सुख-सुविधाओं के साथ-साथ धर्म के अवसर भी प्रदान करता है। इसलिए प्राप्त धर्म, गुरु और जिनेन्द्र भगवान की भक्ति के अवसरों का उपयोग केवल सांसारिक सुखों के लिए नहीं, बल्कि आत्मकल्याण के लिए करना चाहिए।जिनेन्द्र भगवान की महिमा का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि भगवान के विशेष पुण्य के कारण उनके समक्ष अष्ट प्रातिहार्य उनकी दिव्य शोभा को प्रकट करते हैं। उन्होंने धार्मिक क्रियाओं में शुद्धता एवं पवित्रता के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जिनेन्द्र भगवान का अभिषेक करते समय शुद्ध वस्त्र धारण करने चाहिए। फटे-पुराने अथवा अशुद्ध वस्त्रों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। धार्मिक कार्यों में केवल वस्त्रों की ही नहीं, बल्कि शरीर, मन और भावनाओं की पवित्रता भी आवश्यक है।

मुनिश्री ने कहा-अहंकार का क्षय और विनय का विकास होता ह

मुनिश्री ने विनय को धर्म का महत्वपूर्ण अंग बताते हुए कहा कि जो व्यक्ति झुककर श्रद्धा और विनय के साथ भगवान एवं मुनिराजों को प्रणाम करता है, उसके भीतर अहंकार का क्षय और विनय का विकास होता है। विनयपूर्ण भावना जीव को पुण्य के मार्ग पर ले जाती है और उसके आध्यात्मिक जीवन को उन्नत बनाती है।

धर्म में शुद्ध भावना और पूर्ण आचरण आवश्यक

दोनों संतों के प्रवचनों का सार यही रहा कि मनुष्य जन्म अत्यंत दुर्लभ है और इसे केवल सांसारिक उपलब्धियों एवं भोग-विलास में व्यर्थ नहीं करना चाहिए। पुण्य से प्राप्त धर्म, गुरु और जिनेन्द्र भगवान की भक्ति के अवसरों का सदुपयोग करते हुए संयम, विनय, शुद्धता और सम्यग्दर्शन के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए। धर्म में बाहरी आडंबर से अधिक महत्वपूर्ण शुद्ध भावना, सम्यक श्रद्धा, सही ज्ञान और पूर्ण आचरण है। यही आत्मकल्याण एवं मोक्ष की दिशा में जीव का वास्तविक मार्ग है। सभा का मंगलाचरण वर्षायोग समिति के संयोजक रविंद्रकुमार जैन ने किया। चित्र अनावरण एवं दीप प्रज्वलन सम्माननीय जनों द्वारा किया गया। संचालन विद्वत् नवनीत जैन शास्त्री ने किया।