इंदौर। कंचन बाग के समवशरण दिगंबर जैन मंदिर परिसर में रविवार को उत्तम सत्य धर्म की पूजा विधि विधान से आर्यिका श्री सुदृढ़मति माताजी और आर्यिका सुलेखमति माताजी के सानिध्य में हुई। इसमें बड़ी संख्या में उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं ने उत्साह और धार्मिक श्रद्धा भक्ति के साथ भाग लेकर पुण्यार्जन किया। पूजा संपन्न होने के बाद सभी ने अर्घ्य समर्पित किए। उत्तम सत्य धर्म पर आर्यिका श्री सुदृढ़मति माताजी के प्रवचन हुए। इसमें उन्होंने उत्तम सत्य धर्म की विशद विवेचना करते हुए कहा कि अपने जीवन से भी कई सत्य सामने आते हैं। अनुभव से भी कई सत्य सामने आते हैं। दुनिया में भले ही झूठ का बोलबाला है क्योंकि, काल दोष ऐसा है पर फिर भी कभी झूठ का साथ नहीं देना, झूठ की अनुमोदना नहीं करना और झूठ की प्रशंसा नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब कोई हिम्मत करके भले गलत भी हो, गलती भी हो, कैसे भी स्थिति हो कोई सच बोलता है तो उस समय तो उसके सच की वैल्यू करो। उस सच का सम्मान करना चाहिए। भीतर से जब व्यक्ति तब सच बोल भी पाता है।
पाठशाला में अपने बच्चों को जरूर भेज करो: माताजी
आर्यिका श्री सुदृ़ढ़मति माताजी ने समाजजनों का आह्वान किया कि पाठशाला में अपने बच्चों को जरूर भेज करो। इसमें बहाने भी नहीं करो। वह भावी पीढ़ी तैयार हो रही है। आपका भी सुरक्षित भविष्य तैयार हो रहा है। इसलिए पाठशाला से भी जुड़ें और भी जो यहां योजनाएं हैं उनका सही तरीके से क्रियान्वयन होना चाहिए। उन्होंने अनुमोदना करते हुए कहा कि बच्चों को, युवाओं को, विद्यार्थियों को भोजन कराना सच में बहुत सराहनीय पुरुषार्थ है।
बोध कथा का मार्मिक प्रसंग सुनाया
उन्होंने एक बोध कथा के माध्यम से कहा कि एक व्यक्ति की बॉर्डर पर ड्यूटी थी। इस स्थान से दूसरे स्थान पर जो भी वहां जाते थे, उन सब को चेक करना कि उसमें कुछ भी एनालिटिक माल वगैरह तो नहीं है। रोज अच्छे से अपनी ड्यूटी करते। रोज-रोज की सुबह-सुबह की बात है एक मजदूर रोज वहां से अपनी साइकिल पर क्योंकि, उसकी मजदूरी उस साइड होती होगी। शायद तो अपने घर इधर से उधर रोज साइकिल पर उस तरफ जाता था और कभी रेत की बोरी होती थी। वो साहब उस चेक करते। रोज वह मजदूर आता-जाता था। पहचान भी बन गई थी और वह अधिकारी रोज जाने देता था। बहुत वर्ष बीत गए ऐसे ड्यूटी निभाते-निभाते और रिटायरमेंट का टाइम आ गया और अब उनके गांव की ओर जाना था। सब काम समेट कर बहुत समय बाद वह बॉर्डर के उस पार उसका जाने का मौका पड़ा और वह वहां उस तरफ गया। रास्ते में दुकान दिखाई दी। मन में आया कि पोता भी बड़ा हो गया होगा थोड़ा सा। उसके लिए साइकिल लेकर के जाता हूं। वहां जाकर उसने सोचा इस दुकानदार को तो देखा है। एकदम मन में ध्यान में आया कि साइकिल लेकर के मजदूरी के लिए रेत लेकर के जाता था। वह जो मजदूर दिखने वाला व्यक्ति जो रोज वह रेत की बोरी के बहाने रोज एक नई साइकिल तस्करी करके इस पार से उसे पर ले जाता था और अपने एक बड़ी सी दुकान खोल के रखी थी।
बालक की कहानी के माध्यम से उत्तम सत्य धर्म समझाया
माताजी ने कहा कि ऑफिसरों कई बार जीवन बीत जाता है और जो सबसे मुख्य चीज होती है। उसी को इग्नोर मार देते हैं और बाकी की चीज टटोलते रहते हैं। देखते रहते हैं। उस साइकिल पर ही नजर नहीं पड़ी। इसलिए पर तो बहुत दृष्टि पड़ गई। इन गाड़ियों पर तो बहुत दृष्टि पड़ गई पर इसको ढोने वाला, उसको लेकर के चलने वाला यह अनादि निधन आत्मा कितने बॉर्डर पास कर दी। कितनी गाड़ियां बदल दी पर अभी तक उस पर दृष्टि नहीं पड़ रही है और एकदम मामूली चीज है। उसको ऐसा टटोलता हैं ऐसा जीवन बिताते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी सांस बिता देते मेरे बाल ऐसे, मेरे कान ऐसे, मेरे गाल ऐसे उसी में जीवन बीत जाता है। जीते जी स्वयं को और इस सत्य को जान लेना का लेना। चिता में जलने से पहले इस चेतन को जान लेना, जगा लेना। यह परम सत्य है। और यह कषायो के मार्दव के बाद ही इसका परिचय हो पता है। इसका अवलोकन हो पाता है। माताजी ने एक बालक की कहानी के माध्यम से उत्तम सत्य धर्म की पूरी विवेचना की। इससे पहले आर्यिका सुलेखमति माताजी ने अपने गुरु आचार्य श्री सुनीलसागर जी की वंदना करते हुए उनके सत्य धर्म के पालन की शिक्षाओं का बखान कर आचार्य भक्ति के माध्यम से सत्य का ज्ञान कराया।
यह भी रहे मौजूद
इस अवसर पर दीप प्रज्वलन उद्योग पति सचिन जैन परिवार और अन्य पुण्यार्जक परिवारों ने किया। कार्यक्रम में हसमुख गांधी, सतीश जैन, सचिन जैन, एमके जैन एलआईसी, अजीत जैन सहित बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं मौजूद रहीं।




