दिल्ली, ऋषभोदय। पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी के शिष्य मुनिश्री श्रुत सागर जी ने अवगत कराया कि दिल्ली के ऋषभोदय में विराजित पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी ने धर्मसभा में कहा कि जीवन में सब कुछ होने पर भी अहंकार नहीं करना। अहंकारी व्यक्ति का शीघ्र ही सर्वस्व नाश हो जाता है। अहं और वहम जीवन को नष्ट कर देते हैं। अहं और वहम दोनों ही कष्टकारी होते हैं। रावण ने अहंकार किया तो पूरा वंश नाश हो गया। अहंकारी व्यक्ति को उसके मित्र भी छोड़ देते हैं। परिवार-जन भी उससे दूर हो जाते हैं।

क्रन्दन छोड़ो, कल्याण पथ पर चलो

आचार्यश्री ने कहा कि जीवन में कष्ट हो, परेशानी हो, दुःख हो, संकट हो, तो क्रन्दन नहीं करना, रोना नहीं, अपितु दुख के पहाड़ टूटें उस समय गुरु केद्वार पर जाना, प्रभु के पास जाना और गुरुवाणी श्रवण कर कल्याण-पथ का अनुशरण करना। शांति-पथ पर आगे बढ़ना। गुरुवाणी ही आत्म-कल्याणी होती है। गुरु की दिव्य-वाणी अमृत के समान परम-औषधि होती है। गुरु की वाणी जन्म, जरा मृत्यु रूपी रोगों का शमण करती है।

समन्वय रू विश्व मैत्री का महामंत्र

विश्व मैत्री, विश्व शांति, विश्व एकता का कोई सूत्र है तो वह अनेकांत दृष्टि है। जीवन में समन्वय के लिए श्रेष्ठ कोई सूत्र है तो वह अनेकांत दृष्टि है। अनेकांत दृष्टि से ही विश्व, देश, समाज व घर घर में समन्वय संभव है। प्रत्येक प्रत्येक वस्तु में अनंत-गुण होते हैं, व्यक्ति में गुण होते हैं। अनेकांत दृष्टि महान् होती है। अनेकांत के प्रयोग से संपूर्ण विवादों का अंत हो जाता है।

तत्त्वज्ञान का उपाय

तत्त्वज्ञान राग से नहीं होता, तत्त्वज्ञान द्वेष से नहीं होता है। तत्त्वज्ञान वैराग्य से होता है। जब सोच शुचिमय होता है, तो तत्त्व ज्ञान प्रारंभ हो जाता है। राग और द्वेष दोनों ही खतरनाक हैं। एक मात्र वैराग्य-भाव ही सर्व-श्रेष्ठ है। वैराग्य सुख का पो परम- उत्तम-साधन है।

हानि-लाभ, सुख-दुःख, यही संसार का स्वभाव

संसार असार है, जीवन ओस बूँद के समान क्षणभंगुर है। सुख-दुःख, हानि-लाभ तो संसार का स्वभाव है। संसार में संकट न आएँ, कष्ट-परेशानी न आएँ, तो संसार किस बात का। संकटों का नाम ही संसार है। संसार में एक कष्ट समाप्त होता है, तो दूसरा सामने खड़ा होता है। संसार में संकट हजार हैं, विघ्न बाधाएँ बहुत हैं, आयु अल्प है, शत्रु बहुत हैं, रोग करोड़ों हैं, पुण्य क्षीण है, इसलिए संभल कर जियो। शांतिपूर्वक इस संसार से निकल चलो। हर पल सावधान रहो। धर्म-मार्ग का अनुसरण करो।

महात्मा बनना है, तो मन को संभालो

यदि आपको महात्मा बनना है, तो सबसे पहले मन को संभालो। मन की गति सबसे अधिक होती है। मन क्षण भर में पूरे लोक की यात्रा कर लेता है। मन से ही बंध होता है, मन से ही निर्बन्ध हो सकते हो। बंधनों को तोड़ना है, कर्मों से युक्त होना है, तो मन को संभालो। जो मन को संभाल लेता है, वही महात्मा बनता है। महात्मा ही परमात्मा बनता है।