मुनि श्री संभवसागरजी महाराज की शीतकालीन बांचना श्री शांतिनाथ जिनालय स्टेशन जैन मंदिर में चल रही है। प्रतिदिन प्रातः 8:45 से आचार्य श्री की अष्टदृव्यों से संगीतमय पूजन की जा रही है। आज शीतल महिला मंडल शीतलधाम द्वारा गुरुदेव तथा मुनिसंघ की पूजन अष्टदृव्यों से की गई। विदिशा से पढ़िए, राजीव सिंघई मोनू की यह खबर...
विदिशा। मुनि श्री संभवसागरजी महाराज की शीतकालीन बांचना श्री शांतिनाथ जिनालय स्टेशन जैन मंदिर में चल रही है। प्रतिदिन प्रातः 8:45 से आचार्य श्री की अष्टदृव्यों से संगीतमय पूजन की जा रही है। आज शीतल महिला मंडल शीतलधाम द्वारा गुरुदेव तथा मुनिसंघ की पूजन अष्टदृव्यों से की गयी एवं दौपहर में तीन बजे से स्वाध्याय हुआ। सायंकाल 5:30 बजे आचार्य भक्ति एवं प्रश्नमंच का कार्यक्रम संपन्न हुआ।
इस अवसर पर मुनि श्री संभवसागर महाराज ने कहा कि कभी भगवान शीतलनाथ का समवशरण यहां आया होगा। वर्तमान में आचार्य गुरुदेव की आपकी विदिशा नगरी पर ऐसी कृपा हुई कि आपके नगर में ऐसा साक्षात न सही लेकिन, कृत्रिम समवशरण पूर्णता की ओर है और उसमें शीशम का कार्य किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक परिवार का कुछ न कुछ दृव्य शीतलधाम के इस विशाल समवशरण में लगना चाहिये। उन्होंने तीन प्रकार की संल्लेखना का वर्णन करते हुये कहा कि वर्तमान में कायोत्सर्ग मरण तथा इंगनि मरण तो नहीं होता लेकिन, भक्त प्रत्याख्यान मरण किया जाता है, जिसमें क्षपकराज धीरे-धीरे क्रमशः चारों प्रकार के आहार का त्याग करते हुये अंत में प्राणों का त्याग करता है।
वह तो अपने लिये स्वयं निर्यापक थेप्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया मुनि श्री ने चंद्रगिरी पर आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनिराज की समाधि सल्लेखना को उत्कृष्ट समाधि बताते हुए कहा कि उन्होंने भक्त प्रत्याख्यान समाधि सल्लेखना धारण कर स्वयं ही अपने आपको संघ से सीमित कर लिया था। डोंगरगढ़ के चंद्रगिरी पर जब वह समाधि सल्लेखना की ओर आगे बढ़ रहे थे तो मात्र तीन मुनिराज ही उन्होंने अपने पास रखे। वह तो अपने लिये स्वयं निर्यापक थे। उन्होंने धीरे-धीरे अपने शरीर को कृश करते हुये शरीर को छोड़ा तथा पूर्णतया सावधान थे।
उनके अंतिम समय में निर्यापक श्रमण श्री प्रसाद सागर जी तो थे ही वरिष्ठ निर्यापक श्रमण श्री योगसागर जी, निर्यापक श्रमण समतासागर जी सहित छह मुनिराज और पहुंच गये थे। इस प्रकार अंतिम समय में नौ मुनिराजों को सेवा करने का अवसर मिल गया था। जिसमें निस्सीम सागर महाराज भी उक्त समय पर थे। आचार्य श्री जानते थे कि अंतिम समय निकट है लेकिन उन्होंने सभी संघों को उधर आने से रोका वह जानते थे कि यदि खवर फैल गयी तो चंद्रगिरी पर इतनी जनता कैसे समाहित होगी। मुनि श्री ने विदिशा के 2014 का चार मुनिराजों की दीक्षा का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि उस दिन कार्तिक कृष्ण अष्ठमी का दिन था यह शुभ तिथी थी।
आचार्य श्री बर्रो वाले बाबा भगवान आदिनाथ के दरबार से आहार चर्या को निकले हम भी उनके पीछे पीछे निकले तो पता लगा कि आज तो आचार्य श्री बहुत दूर गये है, कहां गये हैं। किला अंदर ऋषि सतभैया के यहां पर उनका पड़गाहन हुआ है। ब्रहम्चारी जी के यंहा से आहार के उपरांत लगभग 11:20 बजे तक गुरुदेव लौटे और उन्होंने मुझे बुलाया। भक्ति का समय था। ऋषि भैया का परिवार सामने थे। उन्होंने कहा कि ऋषि सामने खड़ा है उसकी बहुत भावना है और ऋषि को संकेत मिल गया और उसने गुरुदेव से निवेदन कर दिया। इस प्रकार लगभग 11:30 बजे यह सूचना बिजली की गति से आसपास पहुंची और इस प्रकार चार भैयाजी की दीक्षा का त्वरित निर्णय हो जाता है। आचार्य श्री कोई भी निर्णय पूर्व घोषणा नहीं करते थे। जब त्वरित निर्णय पर ही इतनी भीड़ हो गयी थी। यदि पूर्व सूचना हो जाए तो भीड़ सम्हाले नहीं सम्हलती।




