आचार्य श्री विद्यासागरजी के शिष्य मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज एवं मुनि श्री संधानसागर महाराज का पिच्छिका परिवर्तन समारोह विद्या प्रमाण गुरुकुलम् में रविवार दोपहर एक बजे से रखा गया है। भोपाल से पढ़िए, यह खबर...
भोपाल। आचार्य श्री विद्यासागरजी के शिष्य मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज एवं मुनि श्री संधानसागर महाराज का पिच्छिका परिवर्तन समारोह विद्या प्रमाण गुरुकुलम् में रविवार दोपहर एक बजे से रखा गया है। प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि यह चातुर्मास का सबसे अंतिम कार्यक्रम होता है। जिसमें कोई बोली नहीं होती संयमी श्रावकों द्वारा यह उपकरण जीवदया की दृष्टि से मुनिमहाराज के हाथों में दिया जाता है तथा मूनिराज भी अपनी पुरानी पिच्छिका को सुधी श्रावक परिवार को सौंप देते हैं। जिससे उनके घर परिवार में अहिंसा के भाव जीवित रहें। प्रातःकालीन बेला में मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज ने गुणायतन के अंतरराष्ट्रीय अधिवेशन में आए हुए सभी सदस्यों को सफलता के साथ-साथ धन की सार्थकता का पाठ भी पढ़ाया। मुनि श्री ने कहा कि श्रद्धा भावना और संस्कार से ही समर्पण का भाव जगता है। देश में विद्यालयों की कमी नहीं, लेकिन जितने भी केंद्र हैं। वहां सिर्फ लर्निंग और अर्निंग की बात सिखाई जाती है। पढ़ो और पैसा जोड़ो लेकिन, गुरुकुलम् में केवल लर्निंग और अर्निंग की नहीं,लिविंग का पाठ पढ़ाने की आवश्यकता है। जिससे उनके अंदर के संस्कार जीवित रहें।यह मात्र ऊपर का चोला है यथार्थ को पहचानिए

मुनिश्री ने कहा कि जीवन तो सभी को मिलता है,लेकिन जीने का तरीका सभी का अलग अलग होता है। जन्म की दृष्टि तो सभी का जीवन समान है लेकिन, अंत की दृष्टि से सभी का जीवन समान नहीं होता। उन्होंने कहा कि भौतिक जीवन के इस नाम और रूप से ऊपर उठकर अपने जीवन को देखिये तथा अपने भीतर की संभावनाओं को खुद टटोलिए। यह जो नाम मिला है वह मात्र व्यवहार चलाने का एक साधन है तथा यह रूप जो सामने दिख रहा है। यह मात्र ऊपर का चोला है यथार्थ को पहचानिए। मैं हूं कौन ? मेरा यह नाम और रूप तो अस्थायी है, लेकिन मेरा जो स्वरूप है वह असीम अनंत, अविनाशी और शाश्वत है। उसके भीतर निहित संभावनाएं छिपी हुई है। जिसे हम नहीं पहचान पाते। हम तो अपनी पूरी ताकत को अपने नाम और रूप में लगा देते हैं।

अपने भीतर की क्षमताओं को पहचानो

एक कथानक में मुनिश्री ने कहा कि भक्त भगवान के पास पहुंचा। मुझे इस धरती का सबसे बड़ा भाग्यवान बना दो। कहानी के भगवान हंसे और कहा कि तेरे अंदर तो भगवान बनने की क्षमता है तू भाग्यवान बनने की बात क्यों कर रहा है? बस तेरे अंदर जो है उसी को पहचान लेगा तो तू भाग्यवान नहीं भगवान बन जाएगा। रहा सवाल भाग्यवान बनने का तो वह तो बहुत प्रबल है तभी तो तुझे अच्छा शरीर, अच्छी बुद्धि , अच्छे संस्कार, अच्छा परिवार, धन संपन्नता, सबकुछ अच्छा ही अच्छा तो मिला है। अपने भीतर की क्षमताओं को पहचान लेगा तो तेरा जीवन भी पामर से परमेश्वर, कंकर से शंकर, नर से नारायण, पतित से पावन हो जाएगा। अपने भीतर की भगवत्ता को पहचानो और अभिव्यक्त करो।

जुड़ो न जोड़ो, जोड़ा तो छोड़ो 

उन्होंने कहा कि आज पर्सनालटी डवलपमेंट के लिए तो तरह-तरह के शोज तथा कार्यक्रम किए जाते हैं, लेकिन अपनी आत्मा को संवारने की कोई कोशिश ही नहीं करता? दृष्टि में बदलाव करके अपने आत्मतत्व को पहचानो और अपने मोक्ष मार्ग को पुष्ट करने का एक मात्र लक्ष्य बनाइये। यदि ऐसा दृष्टिकोण बना लोगे तो आपके अंदर के अभिमान, अंदर की आसक्ति के साथ भोगा शक्ति मिटेगी। जिससे परिणाम निर्मल होंगे। जीवन में अभी तक जोड़ा ही जोड़ा है और ऐसे ही एक दिन सब छोड़ देंगे। गुरुदेव ने हायकू के माध्यम से संदेश दिया है कि जुड़ो न जोड़ो, जोड़ा तो छोड़ो जुड़ो तो बेजोड़ जोड़ो जुड़ो आत्मा से, परमात्मा से तथा धर्म से जो तुमने जोड़ा है। अभी तक जो तुमने जोड़ा है, वह सब यही छूट जाना है। अपने भीतर के स्वरूप को पहचानिए और अपने नरभव को सफल बनाइए।

भोपाल में खुलने जा रहे विद्या प्रमाण गुरुकुलम् में दान दिया

प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि चातुर्मास का अंतिम कार्यक्रम पिच्छिका परिवर्तन कार्यक्रम दोपहर एक बजे से विद्याप्रमाण गुरुकुलम् अवधपुरी में आयोजित है। विगत दिनों गुणायतन का राष्ट्रीय अधिवेशन आयोजित हुआ। जिसमें न केवल भारत से वल्कि भारत के बाहर विदेशों से जुड़े गुणायतन के कार्यकर्ता उपस्थित हुए तथा उन्होंने दिल खोलकर भोपाल में खुलने जा रहे विद्या प्रमाण गुरुकुलम् में दान दिया तथा एक एक प्रोजेक्ट को अपने हाथों में लिया। इस अधिवेशन में गुणायतन के राष्ट्रीय पदाधिकारियों के अलावा मध्यभारत क्षेत्र तथा भोपाल गुणायतन से जुड़े सभी सदस्यों ने भाग लिया। विशेषकर शिकागो अमेरिका, दुवई, तथा मुम्बई, दिल्ली, कोलकाता जैसे महानगरों एवं आगरा, जयपुर, इंदौर तथा आसपास के क्षेत्र से बड़ी संख्या में कार्यकर्ता उपस्थित थे।