मुरैना। नगर में चातुर्मासरत आचार्य श्री 108 उदारसागर जी महाराज ने श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि जैन दर्शन के अनुसार प्रत्येक जीव अपने कर्मों का स्वयं कर्ता और भोक्ता है। मनुष्य को अपने कर्मों के अनुरूप फल भोगना पड़ता है।
उन्होंने कहा कि पाप कर्म व्यक्ति की प्रतिष्ठा, पद, धन अथवा शक्ति को देखकर अपना प्रभाव नहीं बदलता। राजा हो या रंक, मंत्री हो या करोड़पति, कर्मों के उदय के समय किसी को भी उनके फल से पूरी तरह बचाव नहीं मिल सकता।
बार-बार की गलती से कमजोर होता है विवेक
आचार्यश्री ने कहा कि पाप कर्म की शुरुआत मनुष्य की वृत्तियों में आए विकारों से होती है। पहली बार अनुचित कार्य करने पर व्यक्ति का विवेक उसे भीतर से रोकता है और संकोच का भाव उत्पन्न होता है। लेकिन जब व्यक्ति उसी गलती को बार-बार दोहराता है, तो उसकी संवेदनशीलता कम होने लगती है।
धीरे-धीरे गलत कार्य भी सामान्य लगने लगता है और व्यक्ति अनुचित आचरण को ही सही मानने लगता है। उन्होंने इसे आत्मिक पतन का कारण बताया।
अनुकूलता में विनम्रता, प्रतिकूलता में धैर्य
आचार्यश्री ने कहा कि पुण्य कर्म के उदय से धन, वैभव, प्रतिष्ठा और सफलता प्राप्त हो सकती है, किंतु ऐसे समय में अहंकार से बचना चाहिए। परिस्थितियां बदलने पर पाप कर्म का उदय व्यक्ति के अभिमान को तोड़ सकता है। इसलिए अनुकूल परिस्थितियों में विनम्रता और प्रतिकूल परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखना आवश्यक है।
उन्होंने राग-द्वेष, क्रोध, मान, माया और लोभ से दूर रहकर सदाचार, संयम एवं सम्यक दृष्टि को अपनाने की प्रेरणा दी।
आत्मनिरीक्षण से होगी कर्मों की निर्जरा
मुनि श्री 108 उपशांतसागर जी महाराज ने कहा कि मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु बाहर नहीं, बल्कि उसके भीतर स्थित कषाय और विकार हैं। जब तक व्यक्ति अपनी कमियों को पहचानने के बजाय दूसरों की गलतियां खोजता रहेगा, तब तक आत्मशुद्धि का मार्ग प्रशस्त नहीं हो सकेगा।
उन्होंने कहा कि अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह केवल उपदेश नहीं, बल्कि जीवन को पवित्र बनाने की साधना हैं। विचार, वाणी और व्यवहार की शुद्धता से ही पाप कर्म से बचने का प्रयास सार्थक होता है।
समभाव और करुणा का संदेश
मुनि श्री ने कहा कि किसी के प्रति ईर्ष्या, अहित की भावना, छल-कपट और स्वार्थवश किसी को कष्ट पहुंचाना आत्मा को अशुद्ध करने वाले भाव हैं। व्यक्ति को प्रतिदिन आत्मनिरीक्षण करना चाहिए, अपनी भूल स्वीकार करनी चाहिए और उसे दोहराने से बचने का संकल्प लेना चाहिए।
उन्होंने कहा कि सुख-दुख दोनों परिस्थितियों में समभाव बनाए रखना जैन साधना का महत्वपूर्ण अंग है। वास्तविक संपदा आत्मा की निर्मलता, श्रेष्ठ आचरण और संयम है।
श्रीफल साथी : मनोज जैन नायक, मुरैना





