मुरैना। बड़े जैन मंदिर में चातुर्मासरत ज्ञानरत्नाकर आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज एवं मुनिश्री उपशांतसागरजी महाराज ने धर्मसभा में कहा कि जैन दर्शन के अनुसार मन, विचार और भावों का जीवन में विशेष महत्व है। मनुष्य को बाहरी परिस्थितियों पर विजय पाने से पहले अपने भीतर उठने वाले विकारों को समझने और उन पर नियंत्रण का प्रयास करना चाहिए।

विचारों को परखना आवश्यक

आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज ने कहा कि मन में अनेक प्रकार के विचार उठते रहते हैं। हर विचार को सत्य मान लेना अथवा उसके आधार पर स्वयं का मूल्यांकन करना उचित नहीं है। विचारों का आना स्वाभाविक है, लेकिन उन्हें स्वीकार करना, उन पर चलना अथवा उनसे दूरी बनाना व्यक्ति के विवेक पर निर्भर करता है।

उन्होंने कहा कि राग, द्वेष, ईर्ष्या, क्रोध और अहंकार बढ़ाने वाले विचारों से बचते हुए क्षमा, करुणा, मैत्री और समभाव जैसे गुणों को अपनाना चाहिए।

दूसरों से पहले स्वयं को देखें

आचार्यश्री ने कहा कि व्यक्ति दूसरों की कमियां देखने में जितनी तत्परता दिखाता है, उतनी ही सजगता अपने भीतर झांकने में दिखाए तो जीवन में सकारात्मक परिवर्तन संभव हैं। आत्मचिंतन से अपनी कमजोरियों का बोध होता है और उन्हें दूर करने की प्रेरणा मिलती है।

उन्होंने कहा कि दोषों को पहचानकर उन्हें छोड़ने का प्रयास करना ही आत्मशुद्धि की प्रक्रिया है। मनुष्य को प्रतिदिन अपने विचार, वाणी और व्यवहार का परीक्षण करना चाहिए कि वे किसी के लिए दुख का कारण तो नहीं बन रहे हैं।

भावों की निर्मलता से बनता है व्यक्तित्व

मुनिश्री उपशांतसागरजी महाराज ने कहा कि मनुष्य के व्यक्तित्व की वास्तविक पहचान उसके बाहरी रूप या शब्दों से नहीं, बल्कि उसके आंतरिक भावों से होती है। वाणी से भावों को छिपाने का प्रयास किया जा सकता है, लेकिन व्यवहार और आचरण में उनका प्रभाव दिखाई देता है।

उन्होंने कहा कि कथनी और करनी में सामंजस्य होना चाहिए। मन की शांति बाहरी साधनों से नहीं, बल्कि आंतरिक संतुलन तथा क्षमा, संतोष, करुणा और मैत्री जैसे निर्मल भावों से प्राप्त होती है।

आत्मविजय ही धर्म की कसौटी

आचार्यश्री ने कहा कि जैन धर्म में आत्मविजय को विशेष महत्व दिया गया है। क्रोध के अवसर पर क्षमा, अहंकार के स्थान पर विनम्रता, छल के स्थान पर सरलता और लोभ के स्थान पर संतोष का भाव अपनाना ही वास्तविक धर्माचरण है।

उन्होंने गुरु भक्तों से शुभ चिंतन में मन लगाने, व्यवहार में मधुरता रखने और प्रत्येक जीव के प्रति करुणा एवं मैत्री भाव विकसित करने का आह्वान किया। दूसरों को बदलने की अपेक्षा स्वयं में सुधार का प्रयास करने से जीवन धर्ममय और सार्थक बनता है।

श्रीफल साथी : मनोज जैन नायक, मुरैना