मुरैना। श्री 1008 पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में आयोजित धर्मसभा में परम पूज्य आचार्यश्री 108 उदारसागरजी महाराज एवं मुनिश्री 108 उपशांतसागरजी महाराज ने ज्ञानाराधना, विनयाचार और जिनवाणी के सम्मान का महत्व समझाया।

संतों ने कहा कि बाहरी अंधकार को दूर करने के लिए प्रकाश की आवश्यकता होती है, जबकि आत्मा पर छाए मिथ्यात्व, मोह, राग और द्वेष के अंधकार को दूर करने के लिए जिनेंद्र भगवान की वाणी तथा सद्गुरु का मार्गदर्शन आवश्यक है।

विनयाचार है ज्ञानाराधना का आधार

आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज ने कहा कि जीवन में ज्ञान का प्रकाश प्राप्त करने के लिए सही दिशा और सद्गुरु का मार्गदर्शन आवश्यक है। समीचीन ज्ञान के लिए गुरु की शरण में जाना तथा ज्ञानाराधना के आठ अंगों का पालन करना चाहिए।

उन्होंने विनयाचार की व्याख्या करते हुए कहा कि स्वाध्याय से पहले शुद्ध जल से हाथ-पैर धोकर और स्वच्छ वस्त्र धारण कर जिनवाणी का अध्ययन करना चाहिए। केवल पुस्तकों का अध्ययन पर्याप्त नहीं है; ज्ञान के प्रति विनय, श्रद्धा और आदर का भाव भी आवश्यक है।

जिनवाणी की मर्यादा बनाए रखें

आचार्यश्री ने दैनिक जीवन की एक त्रुटि की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि जिनवाणी एवं शास्त्रों को सामान्य वस्तुओं के साथ एक ही बैग में रखना उनके प्रति अपेक्षित विनय के अनुरूप नहीं है। जिनवाणी को ज्ञान की जननी मानते हुए उसकी मर्यादा और सम्मान का ध्यान रखना चाहिए।

उन्होंने कहा कि देव, शास्त्र और गुरु के प्रति विनय रखना प्रत्येक श्रावक का कर्तव्य है। विनय केवल बाहरी व्यवहार नहीं, बल्कि धर्म के प्रति श्रद्धा और समर्पण का भाव है।

जिनवाणी के श्रवण से मिलेगी सम्यक दिशा

मुनिश्री उपशांतसागरजी महाराज ने कहा कि जिनेंद्र भगवान के दर्शन और उपदेशों का लाभ लेने के लिए श्रद्धापूर्वक उनके चरणों तक पहुंचना तथा जिनवाणी को समझने का प्रयास करना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि आत्मा पर अनेक जन्मों से छाए अज्ञान, मिथ्यात्व, मोह, राग और द्वेष के अंधकार को जिनवाणी के नियमित श्रवण, धर्म के प्रति श्रद्धा और सद्गुरु के मार्गदर्शन से कम किया जा सकता है। केवल धर्म सुनना पर्याप्त नहीं, उसे समझकर जीवन में उतारना भी आवश्यक है।

मंगलाचरण के साथ हुआ धर्मसभा का शुभारंभ

धर्मसभा का शुभारंभ श्रीमती गुंजन द्वारा मंगलाचरण से हुआ। चित्र अनावरण एवं दीप प्रज्ज्वलन अनिल जैन प्राचार्य, अरविंद जैन, प्रेमचंद जैन एवं बाबूलालजी जैन द्वारा किया गया। विद्वान श्री नवनीत जैन शास्त्री ने सभा का संचालन किया।

श्रीफल साथी : मनोज जैन नायक, मुरैना