महरौनी। मुनिश्री विकौशल सागर महाराज ने प्रवचन में आत्मज्ञान, कर्मों के प्रभाव और मनुष्य के वास्तविक स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्रत्येक मनुष्य के भीतर ज्ञान का प्रकाश विद्यमान है, लेकिन कर्मों के आवरण के कारण वह अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान नहीं पाता।

कर्मों के आवरण से ढका है ज्ञान

मुनिश्री ने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार बादलों के कारण सूर्य का प्रकाश दिखाई नहीं देता, लेकिन बादल हटते ही सूर्य का प्रकाश स्वतः प्रकट हो जाता है, उसी प्रकार कर्मों का आवरण हटने पर आत्मा का ज्ञान और उसका वास्तविक स्वरूप प्रकट होता है। आत्मा स्वयं ज्ञानस्वरूप है, आवश्यकता केवल भीतर देखने और उसे पहचानने की है।

आत्मज्ञान ही वास्तविक अमृत

उन्होंने कहा कि केवल बाहरी ज्ञान प्राप्त कर लेना पर्याप्त नहीं है। आत्मज्ञान ही वह अमृत है, जो मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप की पहचान कराता है। केवली भगवान ने ज्ञानावरणीय कर्म के क्षय के माध्यम से पूर्ण ज्ञान को प्रकट किया। कर्मों के आवरण कम होने के साथ आत्मा का ज्ञान क्रमशः विकसित होता जाता है।

कर्मों के प्रति रहें सजग

मुनिश्री ने कर्म और उसके परिणामों को समझाते हुए कहा कि मनुष्य को अपने कर्मों के प्रति सदैव सजग रहना चाहिए। किए गए कर्मों का प्रभाव निश्चित रूप से सामने आता है। इसलिए जीवन में ऐसे कार्य करने चाहिए, जिनसे आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त हो।

गुण और व्यवहार से बनती पहचान

उन्होंने कहा कि संसार में मनुष्य की पहचान केवल उसके नाम से नहीं, बल्कि उसके गुणों और व्यवहार से होती है। अच्छे गुणों को बढ़ाना ही वास्तविक उपलब्धि है। नाम और यश से अधिक महत्वपूर्ण संस्कार और सद्गुण हैं, क्योंकि यही व्यक्तित्व को स्थायी पहचान प्रदान करते हैं।

पहले स्वयं में लाएं परिवर्तन

मुनिश्री ने श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए कहा कि बाहरी परिस्थितियों को बदलने से पहले अपने भीतर परिवर्तन लाने का प्रयास करना चाहिए। आत्मचिंतन, सद्विचार और अच्छे कर्मों के माध्यम से जीवन को सार्थक बनाया जा सकता है।

आत्मा की ओर बढ़ें

उन्होंने कहा कि आत्मा की ओर बढ़ाया गया प्रत्येक कदम मनुष्य को वास्तविक सुख और शांति के निकट ले जाता है। कर्मों के प्रभाव को समझकर सद्कर्म, संयम और आत्मचिंतन को जीवन का हिस्सा बनाना ही आत्मकल्याण की दिशा में सार्थक प्रयास है।