मुरैना। श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए परम पूज्य आचार्य श्री 108 उदारसागर जी महाराज ने लोकमूढ़ता का स्वरूप समझाते हुए कहा कि धर्म के क्षेत्र में विवेक का होना अत्यंत आवश्यक है। केवल इसलिए किसी धार्मिक क्रिया को करना कि लोग ऐसा करते आ रहे हैं या समाज में उसकी परंपरा चली आ रही है, उचित नहीं है। बिना तत्त्व को समझे लोक-प्रचलित मान्यताओं का अंधानुकरण करना ही लोकमूढ़ता है।
धर्म समझने से पहले पूछें—क्या इससे आत्मकल्याण होगा?
आचार्यश्री ने कहा कि सम्यग्दर्शन के लिए श्रद्धा के साथ विवेक भी आवश्यक है। मनुष्य को विचार करना चाहिए कि जिस क्रिया को वह धर्म समझकर कर रहा है, क्या वह वास्तव में आत्मकल्याण का कारण है? क्या उससे राग-द्वेष और कषायों का क्षय होता है?
यदि किसी कार्य के पीछे केवल भीड़ का अनुसरण, भय, लालच या अंधविश्वास है तो उसे धर्म मान लेना उचित नहीं है।
‘पाप पानी से नहीं, परिणामों की शुद्धि से दूर होते हैं’
आचार्यश्री ने कहा कि जैन दर्शन में लोकमूढ़ता को सम्यक् दर्शन में बाधक दोषों में माना गया है। रत्नकरण्ड श्रावकाचार आदि ग्रंथों में इसके उदाहरण मिलते हैं। नदी या समुद्र में स्नान करने मात्र से पाप धुल जाते हैं और आत्मा पवित्र हो जाती है, ऐसी मान्यता को लोकमूढ़ता बताया गया है।
उन्होंने कहा, “पाप पानी से नहीं, बल्कि आत्मा के परिणामों की शुद्धि से दूर होते हैं।” शरीर को जल से स्वच्छ किया जा सकता है, लेकिन आत्मा की मलिनता दूर करने के लिए सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र की आवश्यकता होती है।
बाहरी प्रदर्शन नहीं, भीतर शुद्ध परिणामों का जागरण है धर्म
आचार्यश्री ने कहा कि किसी स्थान को केवल पवित्र मानकर बालू के ढेर अथवा सिकता के घरौंदे बनाकर उन्हें धर्म समझकर पूजना भी विवेकहीन आचरण है। धर्म किसी बाहरी प्रदर्शन का नाम नहीं, बल्कि आत्मा के भीतर शुभ और शुद्ध परिणामों के जागरण का नाम है।
उन्होंने पर्वत से गिरने अथवा अग्नि में प्रवेश कर जीवन समाप्त करने जैसी मान्यताओं से भी सावधान किया। उन्होंने कहा कि शरीर को कष्ट देना या जीवन समाप्त कर देना मोक्ष का मार्ग नहीं है। जिनवाणी हिंसा से दूर रहकर संयम और आत्मशुद्धि के माध्यम से कर्मक्षय का मार्ग बताती है।
लोकमूढ़ता, देवमूढ़ता और गुरुमूढ़ता से रहें सावधान
आचार्यश्री ने कहा कि जैन दर्शन में विवेकहीन श्रद्धा के तीन प्रमुख रूप बताए गए हैं—लोकमूढ़ता, देवमूढ़ता और गुरुमूढ़ता।
लोकमूढ़ता अर्थात लोक में प्रचलित रूढ़ियों एवं अंधविश्वासों का बिना विचार किए पालन करना। देवमूढ़ता अर्थात सांसारिक इच्छाओं या लौकिक फल की प्राप्ति के लिए राग-द्वेष और कषायों से युक्त देवी-देवताओं को प्रसन्न करने की भावना रखना। वहीं गुरुमूढ़ता अर्थात हिंसा, परिग्रह, आरंभ और असंयम से युक्त पाखंडी साधुओं को वास्तविक गुरु मानकर उनका सत्कार करना।
विवेक और श्रद्धापूर्वक की गई क्रिया ही धर्म : मुनि उपशांतसागर
मुनि श्री उपशांतसागर जी महाराज ने कहा कि जैन धर्म किसी बात को केवल परंपरा के कारण स्वीकार करने की शिक्षा नहीं देता। जिनवाणी के आधार पर तत्त्व को समझना, विवेकपूर्वक श्रद्धा करना और जीवन को आत्मकल्याण की दिशा में ले जाना ही सच्चा धर्म है।
पूजा-पाठ, व्रत, विधान और धार्मिक अनुष्ठान तभी सार्थक हैं, जब उनके माध्यम से आत्मा में निर्मलता, विनय, संयम, करुणा और वीतरागता के भाव जागृत हों।
उन्होंने कहा, “दुनिया क्या कर रही है, यह देखने से पहले हमें यह देखना चाहिए कि जिनेन्द्र भगवान ने क्या कहा है। लोक के पीछे चलने के बजाय जिनमार्ग के पीछे चलना ही मनुष्य जीवन की सार्थकता है।”
आज उत्तम क्षमा धर्म से शुरू होगी दस धर्मों की आराधना
पर्वराज पर्युषण के दस दिवसीय आयोजन आज से प्रारंभ होकर 25 सितंबर तक चलेंगे। इस दौरान दिगंबर जैन मंदिरों में प्रतिदिन विशेष पूजा-अर्चना, प्रवचन, स्वाध्याय तथा धार्मिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
व्याकरणाचार्य महेंद्रकुमार शास्त्री, पूर्व प्राचार्य ने बताया कि प्रथम दिन उत्तम क्षमा धर्म की आराधना होगी। इसके बाद क्रमशः प्रतिदिन एक-एक धर्म की पूजा-अर्चना एवं आराधना की जाएगी।
सुबह 6:30 बजे से रात तक चलेंगे धार्मिक कार्यक्रम
पर्युषण पर्व के दौरान प्रतिदिन प्रातः 6:30 बजे से सामूहिक अभिषेक, शांतिधारा, नित्यमह पूजन एवं विशेष पूजन होंगे। सुबह 8 बजे से आचार्यश्री एवं मुनिश्री के मंगल प्रवचन होंगे।
दोपहर 3 बजे से सिद्धांत ग्रंथ तत्त्वार्थ सूत्र का स्वाध्याय होगा। शाम को गुरु भक्ति, महाआरती एवं शास्त्र सभा और रात्रि में सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।





