मुरैना। नगर में चातुर्मासरत आचार्य श्री उदारसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर में अपने प्रवचनों में जैन दर्शन के निःकांक्षित अंग की व्याख्या करते हुए कहा कि मनुष्य के जीवन में सबसे बड़ी समस्या बाहर की वस्तुओं की कमी नहीं, बल्कि भीतर की बढ़ती हुई आकांक्षाएं हैं। आशा और इच्छाओं का यह सिलसिला ऐसा है कि एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है। उन्होंने कहा कि आशारूपी गड्ढा कितना भी भरने का प्रयास किया जाए, वह कभी भरता नहीं है। इसलिए मनुष्य को इच्छाओं की पूर्ति में जीवन गंवाने के बजाय इच्छाओं के स्वरूप को समझने का प्रयास करना चाहिए। आचार्य श्री ने कहा कि प्रत्येक संसारी जीव पंचेन्द्रिय विषयों के सुख की आकांक्षा रखता है। आंखों को सुंदर दृश्य चाहिए, कानों को मधुर शब्द चाहिए, नाक को सुगंध चाहिए, जिह्वा को स्वादिष्ट भोजन चाहिए और त्वचा को स्पर्श का सुख चाहिए। इन पांचों इन्द्रियों की इच्छाओं को पूरा करने में मनुष्य अपना पूरा जीवन लगा देता है, लेकिन इन्द्रियों की तृप्ति कभी स्थायी नहीं होती। कुछ समय के लिए सुख की अनुभूति होती है और फिर वही मन किसी नई वस्तु की इच्छा करने लगता है।

प्रश्न यह है कि इच्छाएं पूरी हो रही हैं?

उन्होंने कहा कि आज मनुष्य सुख-सुविधाओं, धन-संपत्ति, पद और प्रतिष्ठा को ही जीवन की सफलता मान बैठा है। जिसके पास साइकिल है वह मोटरसाइकिल की इच्छा करता है, मोटरसाइकिल वाला कार चाहता है, कार वाला बड़ी कार चाहता है और बड़ी कार वाला और अधिक वैभव की चाह रखने लगता है। इसी प्रकार पद मिलने पर बड़ा पद, सम्मान मिलने पर और अधिक सम्मान तथा धन मिलने पर और अधिक धन की इच्छा उत्पन्न होती रहती है। प्रश्न यह है कि इच्छाएं पूरी हो रही हैं या इच्छाएं मनुष्य को अपने पीछे दौड़ा रही हैं?

मन नई उपलब्धि की तलाश में निकल पड़ता

आचार्य श्री ने कहा कि संसार का कोई भी भौतिक सुख स्थायी नहीं है। जिस वस्तु को प्राप्त करके आज मनुष्य अत्यंत प्रसन्न हो रहा है, कुछ समय बाद वही वस्तु सामान्य लगने लगती है। जिस उपलब्धि को कभी जीवन की सबसे बड़ी सफलता माना था, उसके बाद मन नई उपलब्धि की तलाश में निकल पड़ता है। यही आकांक्षा का स्वभाव है। इसलिए सुख वस्तुओं में कम और मन की संतुष्टि में अधिक है।

जिस वैभव पर गर्व करता रहा, वह सब यहीं रह जाता है

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि चक्रवर्ती छह खंड का अधिपति होता है। उसके पास अपार धन, वैभव, सत्ता और ऐश्वर्य होता है। उसके आदेश पर असंख्य लोग कार्य करते हैं, लेकिन जब जीवन की अंतिम घड़ी आती है तो इतना बड़ा साम्राज्य भी उसके साथ नहीं जाता। जिस धन को जीवनभर जोड़ता रहा, जिस सत्ता को पाने के लिए प्रयास करता रहा और जिस वैभव पर गर्व करता रहा, वह सब यहीं रह जाता है। जब चक्रवर्ती जैसा महान वैभवशाली व्यक्ति भी संसार छोड़कर खाली हाथ जाता है, तो सामान्य मनुष्य अपने थोड़े से धन, पद और प्रतिष्ठा पर इतना अभिमान क्यों करे?

मुनिश्री उपशांत सागर जी ने कहा कि संसार के इतिहास में अनेक राजा, महाराजा, सम्राट और महापुरुष आए और अपने-अपने समय में उन्होंने अपार वैभव अर्जित किया। लेकिन आज उनका धन और राजपाट कहां है? सब कुछ समय के साथ समाप्त हो गया। इसी प्रकार एक दिन प्रत्येक मनुष्य को भी इस संसार से विदा होना है। इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति वही है जो जीवन रहते यह विचार कर ले कि जो वस्तु मेरे साथ जाने वाली नहीं है, उसके पीछे मैं अपना पूरा जीवन क्यों लगा रहा हूं?

साधन जीवन का उद्देश्य न बन जाए

उन्होंने कहा कि इसका अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य अपने परिवार और आवश्यकताओं की उपेक्षा करे या जीवन के कर्तव्यों से भाग जाए। गृहस्थ जीवन में रहते हुए आवश्यक साधनों का उपयोग करना गलत नहीं है, लेकिन साधन जीवन का उद्देश्य न बन जाएं, यह समझना आवश्यक है। धन हमारे पास रहे, लेकिन धन के प्रति अत्यधिक आसक्ति हमारे भीतर न रहे। वस्तु का उपयोग करें, लेकिन वस्तु को अपने जीवन का स्वामी न बनने दें।

सम्यक दर्शन की निर्मलता का महत्वपूर्ण आधार

मुनिश्री ने कहा कि निःकांक्षित का अर्थ हैकृसांसारिक विषयों और भोगों के प्रति ऐसी लालसा न रखना कि मनुष्य धर्म और आत्मकल्याण को ही भूल जाए। जैन दर्शन में निःकांक्षित अंग सम्यक दर्शन की निर्मलता का महत्वपूर्ण आधार है। सच्चा श्रद्धालु संसार के सुखों को ही जीवन की अंतिम उपलब्धि नहीं मानता। वह जानता है कि बाहरी सुख क्षणिक हैं और आत्मा का वास्तविक सुख भीतर स्थित है।