इंदौर। श्रमण संस्कृति के सबसे महत्वपूर्ण एवं प्रभावी स्तोत्र भक्तामर जो प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ की भक्ति स्वरूप 7वीं शताब्दी में आचार्य मानतुंग स्वामी द्वारा रचा गया। जिसके अभी तक 200 से अधिक अनुवाद एवं समीक्षा टीकाएं लिखी जा चुकी है तथा विश्व की लगभग सभी प्रमुख भाषाओं में जिसका अनुवाद हो चुका है। अत्यंत प्रभावशाली और लोकप्रिय इस स्तोत्र का प्रथम बार एक सनातन संस्कृति में पल्लवित और अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विद्वान नर्मदाप्रसाद उपाध्याय द्वारा टीका तथा अनुवाद लिखा गया। इस महान काव्य रचना का विमोचन गुरुवार को जैन कालोनी स्थित प्रवचन हाल में आदिसागर जी महाराज अंकलीकर परंपरा के चतुर्थ पट्टाचार्य एवं बहुभाषा विद आचार्य श्री सुनीलसागर जी महाराज ससंध के सानिध्य में हुआ।

यह समाज श्रेष्ठी और पदाधिकारी रहे मौजूद

इस विमोचन कार्यक्रम में भारतवर्षीय दिग. जैन तीर्थ संरक्षिणी महासभा के राष्ट्रीय व प्रांतीय पदाधिकारी टीके वेद, देवेंद्र सेठी, कैलाश लुहाडिया, तल्लीन बडजात्या, ओम पाटोदी, पवन पाटोदी, सनत गंगवाल, प्रदीप बिलाला, चातुर्मास कमेटी के संयोजक इंद्र सेठी, गिरिश पाटोदी, सचिन उद्योगपति तथा बडजात्या परिवार के अलावा अन्य श्रावक श्रेष्ठी उपस्थित रहे।

पदाधिकारियों ने किया दीप प्रज्वलन और शास्त्र भेंट

ग्रंथ का प्रकाशन श्रमण संस्कृति सेवा न्यास द्वारा और पूण्यार्जक टीके मंजु वेद तथा महेन्द्र लुहाडिया रहे। प्रकाशक द्वारा बताया गया कि सभी स्वाध्याय प्रेमियों के लिए ग्रंथ निःशुल्क उपलब्ध होगा। गुरुवार की प्रवचन सभा में चित्र अनावरण द्वीप प्रज्वलन तथा शास्त्र भेंट का लाभ भी महासभा पदाधिकारियों को मिला।