सिद्धक्षेत्र कुन्थलगिरि में क्षपकराज मुनि श्री 108 वर्धमान सागर जी (दक्षिण) ने 13 दिवसीय सल्लेखना के बाद 5 जुलाई 2026 की रात्रि 11:34 बजे समाधि प्राप्त की। उनका जीवन तप, त्याग और आत्मविजय की अनुपम मिसाल रहा। पढ़िए श्रीफल साथी पदम जैन बिलाला की यह रिपोर्ट।
कुन्थलगिरि (महाराष्ट्र)। सिद्धक्षेत्र कुन्थलगिरि में जैन परम्परा की तपोभूमि पर एक और आध्यात्मिक इतिहास दर्ज हुआ, जब क्षपकराज मुनि श्री 108 वर्धमान सागर जी (दक्षिण) ने तेरह दिवसीय सल्लेखना पूर्ण कर समाधि का वरण किया। इस घटना से सम्पूर्ण जैन समाज में गहन श्रद्धा और भावुकता का वातावरण रहा।
समाचार का विस्तृत विवरणक्षपकराज मुनि वर्धमान सागर जी ने 13 दिवसीय यम-सल्लेखना के माध्यम से पूर्ण वैराग्य और आत्मसाधना का आदर्श प्रस्तुत किया। इस अवधि में उन्होंने सभी सांसारिक बंधनों का त्याग कर आत्मकल्याण की ओर अंतिम साधना की।
कार्यक्रम, गतिविधि अथवा प्रमुख वक्तव्यसमाधि-स्थली पर आचार्य श्री 108 शांति सागर मुनिराज की परम्परा में यह क्षण अत्यंत पवित्र एवं ऐतिहासिक माना गया। विभिन्न संतों एवं श्रद्धालुओं द्वारा उनके जीवन एवं साधना की सराहना की गई।
महत्वपूर्ण जानकारी23 जून 2026 को उन्होंने यम-सल्लेखना का संकल्प लिया था। 20 फरवरी 2026 को मुनि श्री विद्या सागर जी को उत्तराधिकारी नियुक्त किया गया था। इस सम्पूर्ण अवधि में संघ के साधुओं ने सेवा एवं वैयावृत्ति की।
अतिथि, संत, संस्था या समाजजनों की सहभागितादेशभर से श्रद्धालु कुन्थलगिरि पहुंचे और उनके अंतिम दर्शन किए। विभिन्न साधु-संतों एवं समाजजनों ने उनकी साधना को नमन किया और विनयांजलि अर्पित की।
सम्मान, उपलब्धियां एवं विशेष आकर्षणउनका जीवन संयम, तप, विद्वत्ता और संघ संचालन क्षमता का अद्वितीय संगम रहा। आचार्य पद पर रहते हुए उन्होंने धर्मप्रभावना एवं जैन संस्कृति के विस्तार में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
संदेश, प्रेरणा एवं सामाजिक महत्वउनकी सल्लेखना और समाधि-मरण यह संदेश देती है कि जैन दर्शन में मृत्यु भी साधना का परम उत्कर्ष है। उनका जीवन आत्मविजय और वैराग्य की प्रेरणा का स्रोत रहेगा।
समापन, आभार एवं आगामी कार्यक्रमश्रद्धालुओं एवं संतों द्वारा उन्हें विनयांजलि अर्पित की गई। जैन समाज ने उनके आदर्शों को जीवन में अपनाने का संकल्प लिया।




