दमोह (कुण्डलपुर)। दशलक्षण धर्म की दसदिनी पाठशाला के सातवें दिन उत्तम तप धर्म की व्याख्या करते हुए निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर महाराज ने कहा कि तप केवल शरीर को कष्ट देने का नाम नहीं, बल्कि इच्छाओं पर नियंत्रण और आत्मशुद्धि की साधना है।
उन्होंने कहा कि धूप में पककर फल में मिठास आती है तथा अग्नि में तपकर मिट्टी का साधारण घट मंगल घट बन जाता है। उसी प्रकार तप की अग्नि में तपकर मनुष्य का जीवन भी परिष्कृत और सार्थक होता है।
तप की शुरुआत संकल्प और साहस से
प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं क्षेत्रीय प्रचारमंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ ने बताया कि सातवें दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने उत्तम तप धर्म की आराधना करते हुए उपवास रखा तथा संयम के क्षेत्र में आगे बढ़ने का संकल्प लिया।
मुनिश्री ने कहा कि शरीर कमजोर हो सकता है, किंतु मन में दृढ़ संकल्प जाग जाए तो वही शरीर बड़े कार्य कर सकता है। “इच्छा-शक्ति का नाम तप है और अपनी इच्छाओं का निरोध करना भी तप है।”
साधन सुविधा देते हैं, शांति नहीं
उन्होंने कहा कि संसार में दो मार्ग हैं—एक साधन-सुविधाओं का और दूसरा साधना का। साधन सुविधा तो दे सकते हैं, लेकिन शांति और तृप्ति नहीं। वास्तविक शांति व्यक्ति के भावों, संकल्प और संयम से आती है।
आज मनुष्य सुविधाएं बढ़ाने में लगा है, लेकिन इच्छाओं का कोई अंत नहीं है। इसलिए जीवन में साधनों के साथ साधना को स्थान देना आवश्यक है।
बाह्य और अंतरंग तप
मुनिश्री ने कहा कि अनशन, अवमौदर्य, वृत्ति-परिसंख्यान, रस-परित्याग, विविक्त शय्यासन एवं काय-क्लेश बहिरंग तप हैं। ये शरीर और आहार के संयम से जुड़े हैं।
प्रायश्चित, विनय, वैयावृत्य, स्वाध्याय, व्युत्सर्ग एवं ध्यान अंतरंग तप हैं। ये व्यक्ति के परिणामों के परिष्कार से जुड़े हैं और सहज रूप से दिखाई नहीं देते। बाह्य तप तभी सार्थक है, जब उसका प्रभाव भीतर दिखाई दे।
वस्तुओं के साथ इच्छाओं का परिमाण भी जरूरी
मुनिश्री ने कहा कि वस्तुओं का परिमाण सीमित कर लेने पर भी यदि इच्छाएं अनंत बनी रहें, तो तप अधूरा है। आचार्यों ने परिग्रह के साथ मूर्छा और इच्छा के नियंत्रण को भी महत्व दिया है। सामग्री की सीमा बनाना अपरिग्रह है, लेकिन इच्छाओं की सीमा बनाना भी उतना ही आवश्यक है।
उपवास के साथ अवमौदर्य अर्थात आवश्यकता से थोड़ा कम भोजन करना, रस-परित्याग के माध्यम से स्वाद और आसक्ति पर नियंत्रण तथा विविक्त शय्यासन के माध्यम से एकांत में चिंतन एवं आत्मनिरीक्षण करना भी तप की साधना है।
मन को दबाना नहीं, मांजना है
मुनिश्री ने कहा कि मन की हर बात मान लेना उचित नहीं और मन को दबाना भी समाधान नहीं। आवश्यकता मन को मांजने की है। जब व्यक्ति इच्छाओं का स्वामी बन जाता है तो उसकी चर्या सात्विक, संतुलित और व्यवस्थित हो जाती है।
उन्होंने कहा कि तप केवल साधु-संतों की साधना नहीं है। गृहस्थ भी अपनी दिनचर्या को व्यवस्थित कर, आत्मचिंतन और स्वाध्याय के लिए समय निकालकर, अनावश्यक घूमने-फिरने एवं फैशन की लालसा से दूर रहते हुए सात्विक और सादा जीवन अपनाकर तपस्वी जीवन जी सकता है।
सामूहिक भाव से बढ़ता है धर्मकार्य
मुनिश्री ने पाठशाला में सहयोग दे रहे साधकों और कार्यकर्ताओं की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि कोई भी बड़ा कार्य एक व्यक्ति से पूरा नहीं होता। संतों, साधकों और कार्यकर्ताओं की सामूहिक एवं टीम भावना से हजारों श्रद्धालुओं को समय पर धर्मलाभ और सुविधाएं मिल पाती हैं।
उन्होंने ज्ञानोदय विद्यापीठ एवं पाठशाला के माध्यम से जिनवाणी और गुरुवाणी के भावों को आगे बढ़ाने के प्रयासों की सराहना की।
प्रवचन के समापन पर मुनिश्री ने कहा, “हिम पर हक है गलने वालों का, पथ पर हक है चलने वालों का, दीपक की लौ पर अधिकार जलने वालों का है।” जो तपते हैं, चलते हैं और धर्म की लौ में स्वयं को साधते हैं, उन्हीं का जीवन धन्य होता है।
श्रीफल साथी : राजीव सिंघई, कुण्डलपुर





