कुण्डलपुर (दमोह)। दशलक्षण धर्म के पांचवें दिन उत्तम सत्य धर्म की व्याख्या करते हुए निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने कहा कि “सत्य केवल बोलने का विषय नहीं, बल्कि विचार, वचन और व्यवहार की प्रामाणिकता का नाम है। जो है, जैसा है और जितना है, उसे वैसा ही और उतना ही प्रस्तुत करना सत्य है।”
उन्होंने कहा कि वस्तुस्थिति को बढ़ाकर, घटाकर या बदलकर प्रस्तुत करना असत्य है। जिसकी वाणी में सत्य, व्यवहार में प्रामाणिकता, जिम्मेदारियों में ईमानदारी और दूसरों को अहित से बचाने की भावना है, वही उत्तम सत्य धर्म की वास्तविक आराधना करता है।
विचार में सच्चाई, वाणी में सत्य और व्यवहार में ईमानदारी
राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं क्षेत्रीय प्रचारमंत्री जय कुमार जैन जलज ने बताया कि मुनि श्री ने कहा कि दशलक्षण धर्म के प्रारंभिक चार धर्मों की साधना के बाद सत्य सहित आगे के धर्म साधक को आत्मकल्याण की दिशा में ले जाते हैं।
क्षमा, नम्रता, ऋजुता और शुचिता जैसे धर्म भी सत्य की भूमि पर पुष्ट होते हैं। जाने-अनजाने हुई भूल क्षमा की जा सकती है, लेकिन जानबूझकर किया गया छल और झूठ व्यक्ति के प्रति विश्वास को समाप्त कर देता है।
दूसरे को ठगने वाला स्वयं भी असत्य के जाल में फंसता है
मुनि श्री ने सब्जी खरीदने वाले व्यक्ति और विक्रेता का उदाहरण देते हुए समझाया कि खरीदार अंधेरे का लाभ उठाकर कटा-फटा नोट चलाना चाहता था, जबकि विक्रेता खराब सब्जियां बेचने की योजना बना रही थी। दोनों यह सोचकर प्रसन्न थे कि उन्होंने सामने वाले को ठग दिया।
मुनि श्री ने कहा कि यही संसार का भ्रम है। दूसरे को धोखा देने के प्रयास में व्यक्ति स्वयं असत्य और भ्रम के जाल में फंसता चला जाता है।
कठोर और मर्मभेदी वाणी भी छोड़ें
मुनि श्री ने कहा कि शास्त्रों में यथार्थ कथन को सत्य और असत् कथन को असत्य कहा गया है। पूजन में पढ़ी जाने वाली धर्म की पंक्तियों को व्यवहार में उतारना आवश्यक है।
कठोर, कर्कश और मर्मभेदी वचन सामने वाले को पीड़ा पहुंचा सकते हैं। इसलिए झूठ और परनिंदा के साथ ऐसी वाणी का भी त्याग करना चाहिए, जिससे किसी को अनावश्यक पीड़ा या अहित पहुंचे।
‘आलोचना का अर्थ अपने दोष देखना है’
परनिंदा पर मुनि श्री ने कहा कि दूसरों की निंदा में क्षणिक आनंद मिल सकता है, लेकिन उसका आत्मशुद्धि से संबंध नहीं है। आलोचना का वास्तविक अर्थ दूसरों के दोष गिनाना नहीं, बल्कि स्वयं के अपराधों और दोषों को देखना है।
दूसरों की निंदा को आलोचना समझ लेना आत्मशुद्धि के बजाय अपने दोषों को बढ़ाने वाला व्यवहार बन सकता है।
‘सेवक सेवक होता है, मालिक नहीं’
मुनि समतासागर जी ने सत्य को विश्वास और जिम्मेदारी से जोड़ते हुए कहा कि यदि किसी ने विश्वासपूर्वक कोई अमानत या दायित्व सौंपा है तो उसकी रक्षा करना हमारी जिम्मेदारी है।
उन्होंने सामाजिक एवं धार्मिक संस्थाओं में दायित्व निभाने वालों से कहा कि “समाज के विश्वास से दायित्व पाने वाले स्वयं को मालिक नहीं, सेवक समझें। समाज ने हमें सेवा का अवसर दिया है। सेवक सेवक होता है, मालिक नहीं।”
उन्होंने कहा कि पदाधिकारी या ट्रस्टी में मालिकियत का भाव आने पर संस्था के मूल उद्देश्य प्रभावित हो सकते हैं। समाज की विरासत को सुरक्षित रखना और संस्था के उद्देश्य को आगे बढ़ाना दायित्व निभाने वाले व्यक्ति का धर्म है।
लकड़हारे की कथा से समझाई सत्यनिष्ठा
ईमानदारी का महत्व बताते हुए मुनि श्री ने लकड़हारे की प्रचलित कथा सुनाई। नदी में कुल्हाड़ी गिरने पर लकड़हारे ने सोने और चांदी की कुल्हाड़ियों को अपना बताने से इनकार किया और अपनी लोहे की कुल्हाड़ी ही स्वीकार की। उसकी सत्यनिष्ठा से प्रसन्न होकर उसे तीनों कुल्हाड़ियां मिलने का प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने ईमानदारी का महत्व समझाया।
सत्य के साथ भावना, परिस्थिति और परिणाम भी महत्वपूर्ण
मुनि श्री ने कहा कि सत्य को केवल शब्दों तक सीमित करके नहीं समझा जा सकता। किसी कथन के पीछे की भावना, परिस्थिति और उससे होने वाले परिणाम पर भी विचार आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि ऐसी वाणी जिससे हिंसा हो, किसी परिवार पर संकट आए, किसी को नुकसान पहुंचे या लोकापवाद फैले, सत्य धर्म के अनुरूप नहीं हो सकती। सत्य के साथ अहिंसा और जीवहित का विवेक भी आवश्यक है।
अस्थायी को शाश्वत मान लेना भी भ्रम
मुनि श्री ने कहा कि संसार की अनेक वस्तुएं और परिस्थितियां अस्थायी हैं। उन्हें स्थायी सत्य मान लेना भ्रम है। वास्तविक सत्य को समझने के लिए शाश्वत तत्व की पहचान आवश्यक है।
उन्होंने पांडवों, सीता और रामराज्य से जुड़े प्रसंगों के माध्यम से सत्य एवं धर्म के आदर्शों को समझाया और कहा कि भगवान महावीर का जीवन सत्य, अहिंसा और आत्मशुद्धि की साधना का सर्वोच्च संदेश देता है।




