कुण्डलपुर (म.प्र.)। निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 समतासागरजी महाराज ने प्रवचन में कहा कि जीवन में सुख-शांति और निराकुलता प्राप्त करने के लिए मनुष्य को अतीत की स्मृतियों एवं भविष्य की कल्पनाओं में उलझने के बजाय वर्तमान में जीना सीखना चाहिए।

उन्होंने कहा कि बीती घटनियों को बार-बार याद करना और आने वाले समय की अनावश्यक चिंता करना मन को अशांत करता है। व्यक्ति को गलतियां करने से बचना चाहिए, साथ ही पुराने प्रसंगों और संबंधों से बनी मानसिक गांठों को छोड़ने का भी अभ्यास करना चाहिए।

भूल करना नहीं, बीती बातों का मोह छोड़ना सीखें

मुनि श्री ने आचार्य श्री के दोहे—“भूल नहीं पर भूलना, शिवपथ में वरदान। भूल नदी गिरि को करे, सागर का संधान।” की व्याख्या करते हुए कहा कि गलती करना और बीती बातों को भूलना, दोनों अलग बातें हैं।

उन्होंने कहा कि स्वयं को नहीं भूलना है, बल्कि उन बाहरी विषयों, घटनाओं और आसक्तियों के मोह से मुक्त होना है, जो मन को व्याकुल बनाते हैं। नदी अपने उद्गम पर्वत से आगे बढ़कर समुद्र की ओर प्रवाहित होती है; उसी प्रकार साधक को भी आत्मकल्याण के लिए पुरानी आसक्तियों से आगे बढ़ना होगा।

वर्तमान ही अनुभव का समय है

मुनि श्री ने कहा कि स्मृतियां अतीत से जुड़ी होती हैं और भविष्य केवल कल्पनाओं एवं योजनाओं का विषय होता है। वास्तविक अनुभव केवल वर्तमान में होता है। जब मनुष्य अतीत में उलझा रहता है या भविष्य की चिंता में भटकता है, तब वह वर्तमान के अवसरों और उपलब्ध सुखों का अनुभव नहीं कर पाता।

उन्होंने कहा कि संसारी जीव अक्सर ‘किया था’ और ‘करूंगा’ के बीच जीवन बिताता है। सामने उपलब्ध भोजन का आनंद लेने के बजाय बीते स्वाद या भविष्य की कल्पना में उलझना इसी मानसिकता का उदाहरण है।

आसक्ति घटाने से मिलेगी निराकुलता

दांत और जीभ का उदाहरण देते हुए मुनि श्री ने कहा कि व्यक्ति के पास जो है, उसका मूल्य वह अक्सर नहीं समझता, लेकिन उसके चले जाने पर उसी के विषय में सोचता रहता है। यह प्रवृत्ति वर्तमान में उपलब्ध सुख और अवसरों का अनुभव नहीं करने देती।

उन्होंने कहा कि शांति का संबंध बाहरी परिस्थितियों से अधिक व्यक्ति के परिणामों और मन की अवस्था से है। निराकुल जीवन के लिए मन को धन, अधिकार, स्वामित्व और बाहरी समाचारों जैसी अनावश्यक उलझनों से मुक्त करना आवश्यक है।

चेक, चाबी और चिट्ठी का संदेश

एक प्रसंग के माध्यम से मुनि श्री ने बताया कि केवल ग्रंथों का स्वाध्याय कर लेना पर्याप्त नहीं है। चेक धन-संपत्ति की चिंता, चाबी अधिकार एवं स्वामित्व के मोह और चिट्ठी बाहरी समाचारों एवं संदेशों में उलझे रहने का प्रतीक है। जब तक व्यक्ति व्यवहार में इन आसक्तियों को कम नहीं करेगा, तब तक मन की शांति कठिन रहेगी।

प्रवचन के अंत में मुनि श्री ने बड़े बाबा के अभिषेक की तैयारियों का उल्लेख करते हुए कहा कि श्रद्धा और विशुद्ध भावों से की गई भक्ति आत्मकल्याण की प्रेरणा देती है। बाहरी धार्मिक क्रियाओं के साथ भावों की शुद्धि पर ध्यान देना भी आवश्यक है।

श्रीफल साथी : राजीव सिंघई