कुण्डलपुर (म.प्र.)। निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 समतासागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि सम्यग्दर्शन जीवन में प्रकाश का संचार करता है, जबकि मिथ्यात्व अंधकार का प्रतीक है। जीवन में सार-असार, हेय-उपादेय का विवेक जागृत हो जाए तो व्यक्ति की सोच, व्यवहार और जीवन की दिशा बदल सकती है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को दूसरों की कमियां खोजने के बजाय उनके गुणों को ग्रहण करना चाहिए। जीवन में अच्छाइयों को अपनाना और बुराइयों को छोड़ना ही धर्म का वास्तविक स्वरूप है।
चालनी नहीं, सूप के समान बनें
राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं प्रचारमंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ के अनुसार मुनिश्री ने आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के दोहे ‘सार सार का ग्रहण हो, असार को फटकार…’ की व्याख्या करते हुए चालनी और सूप का उदाहरण दिया।
उन्होंने कहा कि चालनी उपयोगी अंश को नीचे गिराकर अनुपयोगी वस्तु रोक लेती है, जबकि सूप अनाज को सुरक्षित रखकर कचरे को बाहर कर देता है। उसी प्रकार मनुष्य को दूसरों की अच्छाइयों, श्रेष्ठ विचारों और उपयोगी संस्कारों को ग्रहण कर व्यर्थ की आलोचना, दोष-दर्शन और नकारात्मकता को छोड़ना चाहिए।
सम्यग्दर्शन है आत्मकल्याण का आधार
मुनि श्री ने कहा कि सम्यक दृष्टि वाला व्यक्ति आत्मकल्याण और सद्गुणों को महत्व देता है, जबकि मिथ्यात्व से प्रभावित व्यक्ति सही और गलत का विवेक खो सकता है। शास्त्रों में मिथ्यात्व से जुड़ी प्रवृत्तियों को हेय तथा सम्यकत्व से जुड़ी बातों को उपादेय बताया गया है।
उन्होंने कहा कि क्रोध, मान, माया, लोभ, राग, द्वेष, मोह और अज्ञान जैसे विकार आत्मस्वभाव को ढकते हैं। सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र—रत्नत्रय—मनुष्य के विचारों, इच्छाओं और आचरण को सही दिशा देने वाले नियंत्रण के समान हैं।
आचार्य श्री की सूक्ष्म दृष्टि का स्मरण
मुनिश्री ने आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के व्यक्तित्व का उल्लेख करते हुए कहा कि वे व्यक्ति की योग्यता, आवश्यकता और मनोभावों को पहचानकर उसके अनुरूप मार्गदर्शन देते थे। वे समर्थ लोगों को दान एवं सहयोग के लिए प्रेरित करते थे और जरूरतमंदों की सहायता इस प्रकार कराते थे कि उन्हें संकोच न हो।
उन्होंने कहा कि आचार्य श्री ने तप, त्याग, साधना और लोककल्याण के कार्यों से ऐसी विशिष्ट पहचान बनाई कि ‘आचार्य श्री’ कहने मात्र से श्रद्धालुओं के मन में उनका स्वरूप उभर आता है।
कुण्डलपुर में जीवंत हैं गुरु-संस्कार
मुनि श्री ने कहा कि आचार्य श्री की भौतिक देह भले ही सामने न हो, किंतु उनकी साधनामयी मुद्रा, शिक्षाएं और संस्कार कुण्डलपुर के कण-कण में विद्यमान हैं। बड़े बाबा भगवान आदिनाथ को विशाल सिंहासन पर विराजमान देखकर, मंदिर की शिल्पकला और स्तंभों को निहारते हुए श्रद्धालुओं को गुरुवर की दूरदृष्टि और प्रेरणा का अनुभव होता है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से प्रातःकालीन आराधना में माला-जाप, परिक्रमा, स्वाध्याय तथा आत्मचिंतन करते हुए भावों को निर्मल बनाने का आह्वान किया। उनके अनुसार सच्ची भक्ति वही है, जो जीवन में संयम, करुणा, सदाचार और आत्मकल्याण का संकल्प जगाए।
श्रीफल साथी : राजीव सिंघई, कुण्डलपुर





