कुण्डलपुर। निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 समतासागर जी महाराज ने कहा कि धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि करुणा, सेवा, सदाचार और परोपकार को जीवन में अपनाना भी धर्म है। जरूरतमंदों की सहायता, सभी जीवों के प्रति दया, वृद्ध माता-पिता की सेवा और समाज के प्रति दायित्व निभाना पुण्यकारी कार्य हैं। उन्होंने कहा कि दुर्लभ मनुष्य जीवन का उपयोग आत्मकल्याण और परोपकार में करना चाहिए।

धर्म को व्यवहार में उतारने की प्रेरणा

मुनि श्री ने धर्म के व्यावहारिक स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए कहा कि धर्मग्रंथों में आध्यात्मिक ज्ञान के साथ पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन की समस्याओं के समाधान भी निहित हैं। तत्त्वार्थसूत्र जैसे ग्रंथों का अध्ययन जीवन को सही दिशा देता है। उन्होंने कहा कि धर्म किसी पर थोपा नहीं जा सकता, बल्कि उसे समझकर अपने आचरण में उतारना आवश्यक है।

करुणा को सेवा में बदलें

मुनि श्री ने कहा कि बीमार, वृद्ध, विकलांग अथवा दुखी व्यक्ति के प्रति करुणा रखना और उसे सेवा-सहयोग में बदलना धर्म की सार्थक अभिव्यक्ति है। पशु-पक्षियों सहित सभी जीवों के प्रति दया तथा जरूरतमंदों की सहायता करना प्रत्येक व्यक्ति का दायित्व है। पाठशाला, गौशाला और समाजोपयोगी योजनाओं के माध्यम से करुणा को व्यवहार में उतारने की प्रेरणा दी गई।

माता-पिता की सेवा महान धर्म

मुनि श्री ने वृद्ध माता-पिता की सेवा को संतान का प्रमुख कर्तव्य बताया। उन्होंने कहा कि वृद्धावस्था में माता-पिता को प्रेम, सम्मान और सहारे की आवश्यकता होती है। उनकी देखभाल करना, समय पर भोजन-दवाइयों की व्यवस्था करना तथा उनकी बातों को सुनना महान धर्म है। उन्होंने कहा कि बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य एवं संस्कारों का ध्यान रखते हुए उन्हें सही दिशा देना भी अभिभावकों की जिम्मेदारी है।

गुरु परंपरा के प्रति कृतज्ञता

गुरु परंपरा समर्पण समारोह के संदर्भ में मुनि श्री ने कहा कि यह आचार्यों और गुरु परंपरा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का महत्वपूर्ण अवसर है। उन्होंने कहा कि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने अपने जीवन से समाज को दिशा, संस्कार और आध्यात्मिक प्रेरणा दी। मुनि श्री ने कहा कि गुरु के प्रति सच्चा समर्पण केवल शब्दों से नहीं, बल्कि उनके सिद्धांतों को जीवन में उतारने और बताए मार्ग पर चलने से प्रकट होता है।

शीतलनाथ भगवान का मोक्ष कल्याणक मनाया

प्रातःकाल भक्तामर महामंडल विधान, पूज्य बड़े बाबा का अभिषेक, शांतिधारा, रिद्धि कलश एवं पूजन-विधान संपन्न हुआ। जैन धर्म के दसवें तीर्थंकर भगवान शीतलनाथ के मोक्ष कल्याणक पर श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव से निर्वाण लाडू अर्पित किया।

श्रीफल साथी : राजीव सिंघई