दमोह (कुण्डलपुर)। दशलक्षण धर्म के छठवें दिन उत्तम संयम धर्म की व्याख्या करते हुए निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर महाराज ने कहा कि हृदय में प्रभु का आसन और मन पर अनुशासन हो तो जीवन पावन बन जाता है। संयम के बिना जीवन का कोई भी कार्य सुखदायी नहीं हो सकता।

उन्होंने कहा कि संयम केवल साधु-संतों के लिए नहीं, बल्कि समाज, परिवार और देश-दुनिया के बीच रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए आवश्यक है। समय, विचार, वाणी, इंद्रियों और अपनी प्रवृत्तियों पर नियंत्रण ही संयम की वास्तविक साधना है।

धूप दशमी पर बड़े बाबा के दरबार पहुंचे शिविरार्थी

प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं क्षेत्र के प्रचारमंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ ने बताया कि धूप दशमी के अवसर पर निर्यापक श्रमण मुनि समतासागर महाराज, मुनि पवित्रसागर महाराज, ऐलक निश्चयसागर, ऐलक निजानंदसागर एवं ऐलक चैत्यसागर महाराज ससंघ के साथ शिविरार्थियों ने शोभायात्रा निकाली।

धर्म ध्वज, ध्वज-पताकाओं, अश्वारोही, धर्म प्रभावना रथ, डीजे एवं बैंड पार्टी की मधुर स्वर लहरियों के बीच महिला शिविरार्थी तीन-तीन पंक्तियों में भक्ति नृत्य करती हुईं आगे बढ़ीं। बड़ी संख्या में श्रावक सड़क मार्ग से कुण्डलाकार पहाड़ी पर स्थित पूज्य बड़े बाबा मंदिर पहुंचे, जहां बड़े बाबा के दरबार में धूप खेवन का कार्यक्रम अत्यंत भक्तिभाव से संपन्न हुआ।

अभिषेक, शांतिधारा और पूजन

बाल ब्रह्मचारी धीरज भैया, राहतगढ़ एवं ब्रह्मचारी अनूप भैया के निर्देशन में प्रातःकाल भगवान का अभिषेक एवं मुनिश्री के मुखारविंद से शांतिधारा संपन्न हुई। इसके पश्चात सोलहकारण भावना, दशलक्षण धर्म एवं सुगंध दशमी की पूजन श्रद्धापूर्वक की गई।

विचारों पर संयम पहली सीढ़ी

मुनि समतासागर महाराज ने कहा, “सम्यक् यमो वा संयमः”, अर्थात अपने ऊपर सम्यक् रूप से नियंत्रण करना ही संयम है। उन्होंने कहा कि व्यवहारिक जीवन में सबसे पहले विचारों पर नियंत्रण जरूरी है। अनावश्यक और नकारात्मक विचार मन को अशांत करते हैं।

उन्होंने कहा कि किसी का भला कर पाएं या नहीं, किंतु किसी के प्रति बुरा भाव मन में नहीं आना चाहिए। सभी जीवों के सुख और मंगल की भावना रखना भावों पर संयम की पहली सीढ़ी है।

वाणी में मृदुता और मर्यादा रखें

मुनिश्री ने कहा कि परिवार और समाज के बीच रहते हुए वाणी पर संयम रखना अत्यंत आवश्यक है। मुख से निकले शब्द वापस नहीं आते, बल्कि उनका प्रभाव हमारे जीवन और संबंधों पर पड़ता है। बातचीत में मृदुता, विनम्रता, बड़ों के प्रति सम्मान और छोटों के प्रति स्नेह होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि हास्य जीवन को सरस बनाता है, लेकिन हास्य-मजाक मर्यादित होना चाहिए। अनियंत्रित मजाक संबंधों में विवाद पैदा कर सकता है। व्यक्ति का असली परिचय सोशल मीडिया प्रोफाइल से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार और कुछ मिनट की बातचीत से सामने आता है।

वाणी संयम को समझाते हुए उन्होंने जीभ और दांत का उदाहरण दिया तथा कहा कि किसी को कमजोर समझकर उसका अपमान नहीं करना चाहिए। हाथी भी समय आने पर चींटी के सामने असहाय हो सकता है। इसलिए अपनी शक्ति का अहंकार न करें और किसी को तुच्छ न समझें।

समय का अनुशासन जीवन को व्यवस्थित करता है

मुनिश्री ने आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के जीवन का प्रसंग सुनाते हुए समय की मर्यादा का महत्व बताया। उन्होंने कहा कि अनुशासन चाहे बड़े पद पर बैठे व्यक्ति का हो या छोटे कर्मचारी का, जिसने समय का संयम सीख लिया, वह अपने जीवन को व्यवस्थित कर सकता है।

साधन हमारे नियंत्रण में रहें

उन्होंने कहा कि संयम का अर्थ सादगी भी है। जीवन में अनावश्यक सुविधाओं की अपेक्षा कम करें और प्राकृतिक साधनों का अधिक उपयोग करें। आधुनिक युग में रोबोट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे साधनों का उपयोग सुविधा के लिए करें, लेकिन अपनी जिंदगी मशीनों के हवाले न करें। साधन हमारे नियंत्रण में रहें, हम साधनों के नियंत्रण में न आएं।

पर्यावरण संरक्षण को संयम से जोड़ते हुए उन्होंने कहा कि हमारे कारण पर्यावरण प्रदूषित न हो, संसाधनों का अनावश्यक दोहन न हो और हमारे उपयोग से किसी अन्य को असुविधा न पहुंचे। जरूरत के अनुसार संसाधनों का उपयोग करना तथा अतिरिक्त उपभोग से बचना भी संयम है।

प्राणी संयम और इंद्रिय संयम

मुनिश्री ने कहा कि हाथी के लिए अंकुश, घोड़े के लिए लगाम और वाहन के लिए ब्रेक होता है, लेकिन मनुष्य के लिए संयम का ब्रेक सबसे जरूरी है। कषाय भाव आने पर उन्हें ज्ञान और विवेक से नियंत्रित करना चाहिए।

उन्होंने बताया कि छह प्रकार के जीव निकायों की रक्षा करना प्राणी संयम है और पांच इंद्रियों तथा मन पर नियंत्रण रखना इंद्रिय संयम है। जहां प्राणी संयम और इंद्रिय संयम दोनों का पालन होता है, वहीं अहिंसा धर्म पुष्ट होता है।

गृहस्थ के लिए पांच अणुव्रत, तीन गुणव्रत और चार शिक्षाव्रत संयम की व्यावहारिक साधना का आधार हैं। उन्होंने कहा कि बड़े संकल्प की प्रतीक्षा न करें। खान-पान में शुद्धि, रात्रि भोजन का त्याग, अनावश्यक बाहरी भोजन से बचना तथा छोटे-छोटे नियम लेकर उन्हें दृढ़ता से निभाना ही बड़े संयम की शुरुआत है।

श्रीफल साथी : अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’, कुण्डलपुर