कुण्डलपुर। दशलक्षण महापर्व के अंतर्गत उत्तम मार्दव धर्म की व्याख्या करते हुए निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने कहा कि दस दिनों में धर्म को दस नामों से संबोधित किया जाता है, लेकिन ये दसों धर्म एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। ये सभी आत्मधर्म की ही अभिव्यक्तियां हैं।
राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं क्षेत्रीय प्रचार मंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ ने बताया कि मुनिश्री ने कहा, “धर्म समुद्र है तो दस लक्षण उसकी लहरें हैं, धर्म सूर्य है तो दस लक्षण उसकी किरणें हैं और धर्म खिला हुआ पुष्प है तो दस लक्षण उसकी पंखुड़ियां हैं।”
धर्म की पहचान भाव, वचन और व्यवहार में
मुनि श्री समतासागर जी ने कहा कि धर्म केवल पूजा-पाठ और धार्मिक आयोजनों तक सीमित नहीं है। आत्मा में धर्म की अभिव्यक्ति व्यक्ति के भाव, वचन और व्यवहार में दिखाई देनी चाहिए।
दशलक्षण धर्म की साधना का सार शांति, समता और सद्भावना में है। जहां ये भाव विकसित होते हैं, वहां वैर, विवाद और संघर्ष के स्थान पर सौहार्द का वातावरण बनता है।
मार्दव केवल मधुर बोलना नहीं, भीतर से विनम्र होना ह
मार्दव धर्म को समझाते हुए मुनिश्री ने कहा कि ऐसी जगह की कल्पना करें, जहां सिंह और गाय एक ही घाट पर पानी पी रहे हों, सांप और नेवला साथ हों तथा बिल्ली और चूहा भय और वैर छोड़ दें। ऐसा वातावरण शांति, समता और सद्भावना का प्रतीक है।
उन्होंने कहा कि मार्दव का अर्थ केवल मधुर बोलना नहीं, बल्कि भीतर से विनम्र, सहज, लचीला और समभावी बनना है।
फलदार डालियां सिखाती हैं विनम्रता
मुनिश्री ने आचार्यश्री के साथ विहार का एक प्रसंग सुनाते हुए कहा कि हवा में फल से लदी पेड़ों की डालियां झुक रही थीं। आचार्यश्री ने संकेत किया कि फल से लदी डालियां स्वाभाविक रूप से झुक जाती हैं।
मुनिश्री ने कहा कि प्रकृति भी यही संदेश देती है—जिसके जीवन में गुण आते हैं, उसके व्यवहार में विनम्रता स्वतः आने लगती है। जो हर बात में ‘मैं-मैं’ करता है और परिस्थिति के अनुसार झुकने या सामंजस्य के लिए तैयार नहीं होता, उसके भीतर गुणों का विकास अभी अधूरा है।
उन्होंने गुरुवर का कथन भी याद किया—“हम हाथी के साथ तो चल सकते हैं, अपने साथी के साथ नहीं चल सकते।”
हाथी के उदाहरण से समझाया अहंकार का बंधन
मुनि श्री पवित्रसागर जी महाराज ने मान और अहंकार के दुष्परिणामों को हाथी के उदाहरण से समझाया। उन्होंने कहा कि मनुष्य कई बार अपनी प्रतिष्ठा और मान-सम्मान को लेकर इतना सजग हो जाता है कि उसका व्यवहार भी उसी के अनुसार संचालित होने लगता है।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति अपने रूप, रंग, बुद्धि, शक्ति, शरीर, पहनावे और उपलब्धियों का अभिमान कर सकता है, लेकिन बाहरी विशालता वास्तविक महानता का प्रमाण नहीं है।
हाथी के उदाहरण से उन्होंने बताया कि बचपन से छोटे खंभे से बंधे रहने के कारण कई बार शक्तिशाली हो जाने के बाद भी वह उसी धारणा में बंधा रहता है। इसी प्रकार मनुष्य भी पुरानी मानसिक धारणाओं और अहंकार का बंधक बन सकता है।
‘मार्दव स्वयं को नहीं, अपने भीतर के मैं को छोटा करना है’
मुनिश्री ने कहा कि मान व्यक्ति के भीतर हर जगह आगे रहने, अपना नाम होने और प्रचार पाने की इच्छा पैदा करता है। उत्तम मार्दव इसके विपरीत सिखाता है कि वास्तविक महानता दूसरों को छोटा दिखाने में नहीं, आवश्यकता पड़ने पर स्वयं झुकने में है।
आचार्य समन्तभद्र के भावों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि व्यक्ति जितना स्वयं को नमाता है, उतना ही ऊपर उठता है। चंवर भी यही संदेश देता है कि जो नीचे झुकता है, वही ऊपर उठता है।
मुनिश्री ने कहा, “मार्दव स्वयं को छोटा समझने का नहीं, बल्कि अपने भीतर के ‘मैं’ और अहंकार को छोटा करने का धर्म है। अहंकार घटेगा तो विनम्रता आएगी, विनम्रता से शांति, शांति से समता और समता से सद्भावना विकसित होगी।”
पूजन से लेकर समता समाधान तक धार्मिक आयोजन
कार्यक्रम का संचालन बाल ब्रह्मचारी धीरज भैया एवं अनूप भैया ने किया। पंचमेरु, सोलहकारण एवं दशलक्षण धर्म की संगीतमय पूजन संपन्न कराई गई, जिसमें श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव से सहभागिता की।
दोपहर में तत्वार्थ सूत्र का वाचन, शाम को आचार्य भक्ति एवं समता समाधान तथा रात्रि में नाटिका की प्रस्तुति का क्रम रखा गया है।




