पुणे। शाकाहार एवं व्यसनमुक्ति के प्रचारक पुणे के सुप्रसिद्ध डॉ. कल्याण गंगवाल ने कहा कि अहिंसा जैन धर्म का प्राण है। अहिंसा का अर्थ केवल जीवों की हत्या न करने तक सीमित नहीं है, बल्कि संपूर्ण जीव-सृष्टि के प्रति अपनापन, प्रेम, करुणा और सहिष्णुता रखना भी अहिंसा का महत्वपूर्ण अंग है।

‘जियो और जीने दो’ अहिंसा का संदेश

डॉ. गंगवाल ने कहा कि ‘जियो और जीने दो’ भगवान महावीर का प्रमुख संदेश है। जैन सिद्धांतों में शाकाहार का प्रतिपादन भी अहिंसा के इन्हीं मूल तत्वों के आधार पर किया गया है।

उन्होंने कहा कि जैन साधु आत्म-संयम, अहिंसा और निर्धारित आहार-संहिता का कठोरता से पालन करते हैं। ‘भूतानुकम्पा’ अर्थात सभी प्राणियों के प्रति दयाभाव तथा ‘सत्वेषु मैत्री’ अर्थात सभी जीवों के प्रति मित्रभाव जैन धर्म की प्रमुख शिक्षाओं में शामिल हैं।

अहिंसा से जुड़ा शाकाहार

डॉ. गंगवाल ने कहा कि अहिंसाचार की निरंतर पालना के कारण जैन धर्म को विश्व की सर्वाधिक शाकाहारी परंपराओं में माना जाता है। शरीर और मन की विशुद्धता को ध्यान में रखते हुए जैन आचार्यों ने मांसाहार को निषिद्ध माना है।

उन्होंने कहा कि शाकाहार को केवल भोजन की आदत के रूप में नहीं, बल्कि जीवदया, आत्मसंयम और अहिंसक जीवनशैली के रूप में समझना चाहिए।

आहार स्वाद के लिए नहीं, स्वास्थ्य के लिए

डॉ. गंगवाल ने आहार को स्वास्थ्य से जोड़ते हुए कहा कि व्यक्ति को भोजन के चयन में स्वाद की अपेक्षा स्वास्थ्य को प्राथमिकता देनी चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि जो खाद्य पदार्थ कच्चे खाए जा सकते हैं, उन्हें अनावश्यक रूप से उबालने की जरूरत नहीं और जिन्हें उबालकर खाया जा सकता है, उन्हें तलकर खाने से बचना चाहिए।

उन्होंने तली हुई चीजों के सेवन को यथासंभव कम करने तथा संतुलित एवं प्राकृतिक आहार अपनाने पर जोर दिया।

फाइबरयुक्त आहार स्वास्थ्य का आधार

उन्होंने कहा कि सुबह उठकर पानी पीना, भोजन के बाद छाछ लेना और सोने के समय दूध का सेवन जैसे पारंपरिक आहार-विहार के साथ तंतुमय एवं रेशायुक्त यानी फाइबरयुक्त खाद्य पदार्थ स्वास्थ्य के लिए उपयोगी हो सकते हैं।

उन्होंने कहा कि संतुलित आहार और नियमित जीवनशैली व्यक्ति को स्वस्थ रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

भोजन के समय प्रसन्न वातावरण जरूर

डॉ. गंगवाल ने कहा कि भोजन करते समय वातावरण आनंदमय और तनावमुक्त होना चाहिए। तनावपूर्ण वातावरण पाचन प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है। इसलिए भोजन को शांत मन और सकारात्मक वातावरण में ग्रहण करना चाहिए।

उन्होंने सप्ताह में एक बार उपवास को भी स्वास्थ्य के लिए लाभकारी बताया और संयमित जीवनशैली अपनाने का संदेश दिया।

अहिंसा, स्वास्थ्य और मानवता का संदेश

डॉ. कल्याण गंगवाल ने कहा कि अहिंसा केवल धार्मिक सिद्धांत नहीं, बल्कि जीवन जीने की ऐसी दृष्टि है जिसमें मनुष्य स्वयं सुखी रहने के साथ दूसरे जीवों के जीवन और अस्तित्व का भी सम्मान करता है। शाकाहार इसी भावना को व्यवहार में उतारने का एक माध्यम है।