नासिक। दांडिया और गरबा रास देशभर में उत्साह के साथ आयोजित किए जा रहे हैं। इन आयोजनों को जैन समाज में शालीनता, भक्ति, सांस्कृतिक अभिव्यक्ति और सुरक्षित सहभागिता के मंच के रूप में विकसित करने की आवश्यकता है।

लेखक पारस लोहाड़े ने कहा कि समाज की बेटियों, महिलाओं और युवाओं को अपने ही सांस्कृतिक परिवेश में आनंदपूर्ण तथा सुरक्षित अवसर उपलब्ध कराना समय की जरूरत है। ऐसे आयोजनों में अनुशासन, मर्यादित परिधान, पारिवारिक सहभागिता और सुव्यवस्थित व्यवस्थाएं प्राथमिकता होनी चाहिए।

औरंगाबाद गुरु परिवार का उदाहरण

पारस लोहाड़े के अनुसार, औरंगाबाद में तरुणसागर गुरु परिवार द्वारा वर्ष 2008 में क्रांतिकारी राष्ट्रसंत मुनि श्री तरुणसागर जी महाराज के मार्गदर्शन एवं सान्निध्य में युवाओं ने जैन दांडिया आयोजन की शुरुआत की थी। इसका उद्देश्य युवतियों और महिलाओं को सुरक्षित तथा सांस्कृतिक वातावरण में गरबा रास का अवसर देना था।

उन्होंने बताया कि आयोजन को गुरु परंपरा से जुड़े क्षुल्लक श्री पर्वसागर जी का मार्गदर्शन भी प्राप्त होता है। पिछले वर्षों में यह आयोजन निरंतर विस्तार के साथ समाज की सहभागिता का महत्वपूर्ण माध्यम बना है।

अनुशासन और सहभागिता का वातावरण

लेखक ने 11 अक्टूबर को औरंगाबाद में आयोजित दांडिया कार्यक्रम में उपस्थिति का उल्लेख करते हुए बताया कि वहां भव्य पांडाल, प्रवेश-पास व्यवस्था, दर्शकों के लिए बैरिकेडिंग, सुसज्जित पार्किंग और विविध स्टॉलों की व्यवस्थाएं की गई थीं।

उनके अनुसार, हजारों युवक-युवतियों और परिवारों ने भक्ति एवं उत्साह के साथ कार्यक्रम में भाग लिया। समाज के वरिष्ठ पदाधिकारी भी युवा आयोजकों के साथ सक्रिय रूप से खड़े रहे।

केवल चर्चा नहीं, रचनात्मक पहल जरूरी

लेखक का मत है कि सामाजिक सरोकारों के लिए केवल चर्चाएं पर्याप्त नहीं होतीं। समाज को युवाओं की रुचि, सुरक्षा और संस्कारों को ध्यान में रखकर रचनात्मक आयोजन करने चाहिए। जैन दांडिया जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से परिवारों को साथ लाने, युवा पीढ़ी को समाज से जोड़ने और सांस्कृतिक मूल्यों को व्यवहार में उतारने का अवसर मिलता है।

उन्होंने देशभर के जैन समाज से आग्रह किया कि ऐसे आयोजनों को भक्ति, मर्यादा, सुरक्षा और सामुदायिक सहभागिता की दृष्टि से प्रोत्साहित किया जाए।

श्रीफल साथी : पारस लोहाड़े, नासिक