आगरा। निर्मल सेवा सदन, छीपीटोला में पट्टाचार्य आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी के तीन शिष्य मुनि श्री समत्व सागरजी महाराज, मुनि श्री शील सागरजी महाराज,मुनि श्री सुप्रभात सागर जी महाराज ससंघ के सानिध्य में धर्मसभा का शुभारंभ पदाधिकारियों ने आचार्य विराग सागर जी महाराज के चित्र अनावरण और मुनि श्री का पाद प्रक्षालन करके किया। मुनि श्री समत्व सागर जी ने कहा कि तुम्हारी अलग पहचान होती कैसे? आदित्य ज्ञानी, नया चश्मा लेके आया। लग रहा था ऐसा चश्मा तो मात्र मेरे पास ही है दूसरे के पास हो ही नहीं सकता। जब मैं माता साड़ी खरीदने गए तो लगा कि यह साड़ी तो किसी और के पास होगी ही नहीं। भले ही वह कचरा डिब्बे में से आई हो लेकिन, मेरी पहचान बनेगी। हां, ऐसा होता है कचरे में से आई हुई भी साड़ी बड़ी अच्छी हो जाती है।
यही तो धैर्य और क्षमता होती है जो अंदर होती है
ऋषभ हर व्यक्ति अपने आप को बहुत ज्ञानी-ध्यानी समझता है। समझता है मेरे से जैसा समझदार कोई नहीं है। एक घटना ऐसी घटी चातुर्मास चल रहा था और चातुर्मास के मध्य में त्योहारों का समय आता है और व्यापार में वृद्धि होती है। ऐसे ही जो मेरे पास में एक युवा मेरे साथ में हमेशा वैयावृत्ति या समय-समय पर वे आते थे और वे चर्चा करते थे, कहीं ना कहीं वे अपने व्यापार को लेकर भी चर्चा करते थे। एक दिन थोड़ा देर से आया। जितने समय आता था उतने समय पर नहीं आया। मैंने पूछा, 'आज क्या बात है? आज देर हो गई?' 'अरे एक अम्मा आ गई।' साड़ी की दुकान थी उसकी। अम्मा आ गई थी और त्योहार का सीजन था और बहुत भीड़ थी और मैं तो निकलने ही वाला था लेकिन वह अम्मा आ गई। मैंने जितना नया माल आया था महाराज जी, सब दिखा दिया लेकिन, अम्मा को कोई पसंद नहीं आया। अब चिल्ला तो सकता नहीं था। यही तो धैर्य और क्षमता होती है जो आपके अंदर होती है लेकिन आप पहचान नहीं पाते। वह बालक बैठा रहा तो मैंने कहा, 'क्या किया?' फिर नहीं लेके गए इतनी देर से कहते, 'महाराज जी, आधा घंटा हो गया मुझे लेकिन, आधे घंटे से मैं एक साड़ी सेलेक्ट नहीं करवा पाया।
पहले आके यही बोला था उसने, 'बड़ा मज़ा आया।'
लेकिन दुकानदार तो दुकानदार था। उसने कहा, 'अम्मा, अरे मैं एक चीज़ भूल गया। वह लेके आता हूँ आपके लिए।' पूरी हो गई, अब खाली हाथ तो जाने नहीं देना है। खाली हाथ जाएगा तो व्यापारी व्यापारी कैसा? व्यापारी है अर्थात दुकान पे कोई चढ़ा है और खाली हाथ जाए, यह संभव नहीं है। अब उसने क्या किया गया और जो डैड (डेड) स्टॉक था, डेड स्टॉक हो जाता है? पुरानी फैशन जो होती है वह चली जाती है। कुछ दिनों बाद ही पुरानी फैशन चली जाती है और वह माल अंदर गोडाउन (गोदाम) में रख जाता है। उसने कहा, 'अम्मा, अभी-अभी लौट के आई है।' वह साड़ी वहाँ से निकाल के लाया जो चार साल से बिकी नहीं थी और जैसे ही लाया, 'अम्मा देखो, अभी-अभी कहीं दूसरी जगह आपको किसी दुकान में मिलेगी ही नहीं। आप कहीं भी जाएँगे, यह देखिए, ऐसा केवल एक ही पीस मिला है मुझे। अभी-अभी माल खुला है, एक ही पीस मिला है।' अम्मा बोली- अम्मा भी समझदार थी। आप भी जानते हो कि समझदारी लेकिन कितनी समझदारी आपकी है देखना। उसने बोला, 'नहीं, यह तो पहले चलता था ना? यह कार्य तो पहले चलता था ना, अब नहीं चल रहा ना?' उसने कहा, 'नहीं नहीं अम्मा, अभी आपको पता नहीं है। फिर से फैशन लौट के आ गया है और फिर से यह चीज़ें चालू हो गई हैं और इतना अच्छे से बहलाया जो अभी का माल था, क्यों? 'अलग दिखना है, अलग पहचान बनाना है। जो चल रहा था, उसमें मेरी पहचान नहीं बन रही थी, यह तो सबके पास है। मुझे तो वह चाहिए था जो किसी के पास नहीं है और वह साड़ी लेके आ गया। कहता, 'महाराज जी, आज तो बड़ा मज़ा आया।' पहले आके यही बोला था उसने, 'बड़ा मज़ा आया।' क्या? चार साल से जो माल नहीं बिक रहा था ना, वह माल मैं बेच के आ गया।
बार-बार यह फैशन क्यों बदलती है?
अब बताइए, माँ कितनी समझदार थी ना? कितने समझदार थे ना? लग रहा था कि मैं अपनी पहचान बना रहा हूँ, अपनी पहचान के लिए मैं बाहरी वेशभूषा से अपनी पहचान देखना चाह रहा हूँ। तो बार-बार यह फैशन क्यों बदलती है? क्योंकि हम अपनी पहचान बाहरी वेशभूषा से बनाते हैं और बाहरी वेशभूषा तुम्हारी बाहरी पहचान हो सकती है लेकिन, तुम्हारी पहचान नहीं हो सकती। मंच संचालन सतेंद्र जैन साहूला ने किया।
यह समाजजन मौजूद रहे
इस मौके पर श्रुत मंथन वर्षायोग समिति के मनोज जैन, रमेश जैन, प्रवीण जैन (पद्मावती), आनंद जैन, शैलेश जैन (लालाजी), मुकेश जैन, रमेश जैन, आशीष जैन, विवेक जैन, चक्रेश जैन, सतेंद्र जैन (साहुला),आशीष जैन (बाबा), सचिन जैन(तार), राजीव जैन, आशु (वीके), रोहित जैन,नितिन, सनी, मीडिया प्रभारी राहुल जैन समस्त मंडल वं सकल जैन मौजूद था।




