आगरा। मुनि श्री समत्व सागर जी ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि कि मैं जितना भी कुछ बचपन से करने का प्रयास करता हूँ, लोग मुझे देखें, मेरी पहचान हो और दूसरी बात है- मेरा आनंद भी रहे, शांति भी मिले किंतु मुझे आज तक एक भी ऐसी दुकान नहीं मिली जहाँ यश कीर्ति मिलती हो, जहां पर शांति और आनंद मिलता हो। अगर कहीं मिल जाता ना, तो बड़ा आनंद हो जाता तो फिर जितने करोड़पति, अरबपति थे, सब वे सब आनंद और शांति को अपने लिए बहुत अच्छे से खरीद सकते थे और जो यह सोच रहे थे कि अब तो मेरे जीवन में कुछ है ही नहीं, क्यों? मेरे पास पैसा नहीं है। मेरे पास पैसा नहीं है इसलिए आनंद नहीं मिल सकता है, मेरा यश-कीर्ति, नाम, ख्याति नहीं हो सकती। यह दौड़ जो चल रही थी कहीं न कहीं अपने आप को स्थापित करने की, अपनी पहचान बनाने की, तो लोगों ने उसे सब कुछ को पद, प्रतिष्ठा, पैसे, यश-कीर्ति से जोड़ रखा था। रियल लाइफ जो होती है अब देखना, यह जो यहाँ पर दिख रहा है, एक छोटा सा सदन हो सकता है और मैंने तो बड़ी अच्छी-अच्छी फ्लाइट्स में मैगज़ीन देखीं, जब आप विदेश यात्रा करते हैं तो बड़ी इंग्लिश मैगज़ीन्स सभी फ्लाइट्स में उपलब्ध रहती हैं। इससे पूर्व निर्मल सेवा सदन, छीपीटोला में आयोजित आचार्य भगवन श्री विशुद्ध सागर जी के शिष्य मुनि श्री समत्व सागर जी, मुनि श्री शील सागरजी, मुनि श्री सुप्रभात सागरजी ससंघ के सानिध्य में धर्म सभा का शुभारंभ आचार्य विराग सागर जी महाराज के चित्र अनावरण और मुनि श्री के पाद प्रक्षालन से हुआ।
हवाई यात्रा करने वाले की चाल बदल जाती है
पंडित जी, सब लोगों ने हवाई यात्राएं जिनने की हैं, उनसे पूछना, वह एक अलग ही वातावरण होता है और आदमी यहीं का होता है। जो यहाँ के छीपीटोला के छोटे से नगर में भी घूमता मिलता है लेकिन जब वहाँ जाता है तो उसको लगता है, मेरे से ज्यादा बड़ा आदमी कोई नहीं है। चाल बदल जाती है। जो यहाँ से धक्के खाके बस में चढ़ता है, हाँ, यहां जब रहता है ना तो हो सकता है जब रिज़र्वेशन न हो तो ट्रेन में एक सीट के पीछे लड़ता मिले। और जब ट्रेन में भी रज़र्वेशन न मिले, तो बस में भी खड़ा-खड़ा जाता मिले। लेकिन जैसे ही एयरपोर्ट में पहुँचता है, इतने ही नहीं, एयरपोर्ट की जैसे ही सीमा में पहुँचता है, अब तो उतरने का उतरने का ढंग बदल जाता है। चाल बदल जाती है। जो व्यक्ति अभी सब्ज़ी मंडी के ठेले पर खड़ा हुआ फल के लिए, दो-पाँच रुपये के लिए चर्चा कर रहा था, संवाद कर रहा था, अब तो ऐसा वीआईपी बनता है कि कोई मुझसे बात करेगा तो करूँगा, नहीं तो कोई मेरे से मेरे को देखने वाला सब कुछ मुझे ही देखने वाले हैं, मैं बहुत बड़ा बन गया हूँ।
ऊपरी वेशभूषा से बदलते हैं ना, वे तुरंत पकड़े जाते हैं
बड़ा बन गया हूँ। अब देखना, वह बड़ा बन गया है और क्या हुआ? बड़ा बनने के बाद अब जैसे ही फ्लाइट में बैठा है, अब तो फ्लाइट में हूँ तो वेशभूषा तो सामान्य नहीं हो सकती। तो अच्छी टी-शर्ट, जींस या फिर कोर्ट और अच्छी, है ना? आपको अगर फ्लाइट में जाना है तो ऐसे ही जाओगे क्या? तो हो सकता है आप भी यह सोचो कि ऐसी साड़ी अच्छी नहीं लगेगी। तो हम क्या करते हैं? हम भी जींस-टीशर्ट पहन लेते हैं। हाँ, हो रहा है। माँ, आप लोग अच्छे लोग नहीं हैं ना? यह साड़ी थोड़ी ना एयर एयरोप्लेन में अच्छी लगती है? अगर बच्चों को, अपने माता-पिता को लेके जाना हो ना और अगर कुरते-पजामे में जा रहे हों मुरारी लाल जी, आपकी वेशभूषा में हों और तिलक लगा हो, तो बताओ अच्छे लोग चाहेंगे क्या? मतलब कैसे लगेंगे? ओल्ड फैशन लगेंगे ना? आप साड़ी पहनेंगे तो ओल्ड फैशन लगेंगे। आपने तुरंत बदल दी वेशभूषा। अब बदल तो दी, लेकिन जितने ऊपरी वेशभूषा से बदलते हैं ना, वे तुरंत पकड़े जाते हैं। वे इतने कॉन्शियस हो जाते हैं, इतने कॉन्शियस हो जाते हैं चीजों को धारण करने के बाद कि अपनी टी-शर्ट ही सही करते रहते हैं।
हाँ, मैं यहाँ सबको पकड़ लेता हूँ। चाहे अंग्रेज़ी माध्यम वाले हों
सत्य बोल रहा हूँ। यानी आप विचार कर लेना, कई बार जो बच्चे स्मार्ट बनने के चक्कर में शॉर्ट्स पहन लेते हैं या स्किन टाइट्स कपड़े पहन लेते हैं, वे कपड़े पहनने के बाद में वे अनकम्फर्ट ज़ोन में चले जाते हैं। और दिखाने के राग में पहने जाते हैं, लेकिन उनका पूरा का पूरा मस्तिष्क उन कपड़ों को देखने में ही लग जाता है और तुरंत पकड़े जाते हैं कि बाबूजी बनके निकला है। बाबूजी हैं नहीं, बाबूजी बनके निकला है। ऐसे ही जब वह कार में जब वह फ्लाइट में पहुँचा है, अब हिंदी तो अच्छे से पढ़ना नहीं आती और आदित्य, यानी अगर वहाँ पर पहुँच जाए और सम्मान हो रहा हो, जब फ्लाइट का सफ़र हो, बेटा, हर व्यक्ति की... मेरी भी जब मैं बोल रहा हूँ, मेरी भी मैं बोल रहा हूँ, जब मैं वहाँ गया था ना, तो इतनी अच्छी इंग्लिश तो मुझे नहीं आती। मुझे लगता है कि पढ़ना किसी को आती हो जैसी उन मैगज़ीन्स में लिखी रहती है। हाँ, मैं यहाँ सबको पकड़ लेता हूँ। चाहे अंग्रेज़ी माध्यम वाले हों, उनसे इंग्लिश में बात करने लगो-महाराज जी, वह भी समझ में नहीं आ रही। हिंदी में बात करने लगो-वह भी नहीं आ रही।
अगर ऐप्पल होगा तो जरूर निकाल के दिखाएगा आपको
तन्मय, सत्य है ना? जो इंग्लिश मैगज़ीन्स में लिखी होती है, क्या हर चीज़ हम पकड़ सकते हैं क्या? लेकिन जब मैं बैठा था, तब तो ऐसा लग रहा था कि वैसे गाने सुनने का शौक नहीं था, लेकिन उस समय मोबाइल जो था ना, उसमें अगर ऐप्पल होगा तो जरूर निकाल के दिखाएगा आपको। वह दिखाएगा कि श्मैं बड़ा हूँ।श् बड़ा हूँ, दिखा रहा है। क्यों? वही जो घर पे घूम रहा था, वहाँ पे तुम्हारी कोई कीमत नहीं थी, लेकिन वहाँ दिखाने की प्रवृत्ति थी। अब वह मैगज़ीन पलटना चालू की और मैगज़ीन में इतने अच्छे-अच्छे, सुंदर-सुंदर फोटो थे, अब तो वह आकर्षित हो गया कि मुझे इस सिटी में घूमने जाना है। मंच संचालन विकर्ष शास्त्री जी ने किया स
यह समाजजन मौजूद रहे
इस मौके पर श्रुत मंथन वर्षायोग समिति के मनोज जैन, रमेश जैन, प्रवीन जैन (पद्मावती), आनंद जैन, शैलेश जैन (लाला जी), मुकेश जैन, रमेश जैन, आशीष जैन, विवेक जैन, चक्रेश जैन, सतेंद्र जैन (साहुला),आशीष जैन (बाबा), सचिन जैन(तार), राजीव जैन, आशु (वी.के), रोहित जैन,नितिन, सनी, मीडिया प्रभारी राहुल जैन समस्त मंडल एवं सकल जैन मौजूद था।



