मुरैना। श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री 108 उदारसागरजी महाराज ने कहा कि गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी व्यक्ति दृढ़ संकल्प के माध्यम से हिंसा का त्याग कर सकता है। अहिंसा केवल साधु-संतों के लिए ही नहीं, बल्कि प्रत्येक श्रावक के जीवन का महत्वपूर्ण धर्म है। व्यक्ति यदि अपने मन, वचन और व्यवहार को पवित्र बनाने का संकल्प ले ले तो वह अनेक प्रकार की हिंसाओं से बच सकता है। अहिंसा की वास्तविक शुरुआत विचारों की शुद्धता और प्रत्येक जीव के प्रति दया एवं करुणा के भाव से होती है।

आचार्यश्री ने जैन शास्त्र रत्नकरण्ड श्रावकाचार के 53वें श्लोक का उल्लेख करते हुए कहा-

सङ्कल्पात्कृतकारितमननाद्योगत्रयस्य चरसत्वान् ।

न हिनस्ति यत्तदाहुः स्थूलवधाद्विरमणं निपुणाः ॥53॥

इस श्लोक का अर्थ समझाते हुए उन्होंने कहा कि जो गृहस्थ मन, वचन और काय से स्वयं हिंसा करने, दूसरों से हिंसा कराने तथा हिंसा करने वालों की अनुमोदना करने के संकल्प का त्याग कर दो इंद्रिय, तीन इंद्रिय, चार इंद्रिय और पांच इंद्रिय वाले त्रस जीवों का घात नहीं करता, उसे ज्ञानी पुरुष स्थूल हिंसा से विरक्त कहते हैं। अर्थात गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी व्यक्ति अपनी इच्छा और संकल्प से होने वाली हिंसा का त्याग कर सकता है।

सभी जीवों के प्रति दया और करुणा का भाव रखना चाहिए

आचार्यश्री ने कहा कि हिंसा केवल किसी जीव को स्वयं मारने से ही नहीं होती, बल्कि हिंसा के तीन रूप हैंकृकृत, कारित और अनुमोदना। कृत का अर्थ है स्वयं हिंसा करना, कारित का अर्थ है दूसरे से हिंसा करवाना और अनुमोदना का अर्थ है किसी अन्य व्यक्ति द्वारा की जा रही हिंसा का समर्थन करना अथवा उससे प्रसन्न होना। इसी प्रकार मन, वचन और काय इन तीन योगों के माध्यम से भी व्यक्ति हिंसा के पाप का भागीदार बनता है। इसलिए अहिंसा का पालन केवल हाथों से किसी जीव को नहीं मारने तक सीमित नहीं है, बल्कि मन में हिंसा के विचार नहीं आना और वाणी से भी किसी को हिंसा के लिए प्रेरित नहीं करना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि गृहस्थ के लिए एक इंद्रिय जीवों की हिंसा से पूर्ण विरक्ति व्यावहारिक रूप से कठिन हो सकती है, क्योंकि दैनिक जीवन की अनेक गतिविधियों में सूक्ष्म जीवों की हिंसा हो जाती है लेकिन, इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि व्यक्ति जानबूझकर जीवों की हिंसा करे। श्रावक कम से कम संकल्पपूर्वक त्रस जीवों की हिंसा का त्याग तो कर ही सकता है। चींटी, मक्खी, मच्छर, पशु-पक्षी सहित सभी चलने-फिरने वाले जीवों के प्रति दया और करुणा का भाव रखना चाहिए।

किसी जीव के प्रति द्वेष न हो, वाणी में कठोरता न हो

आचार्यश्री ने उदाहरण के माध्यम से समझाया कि यदि कोई व्यक्ति स्वयं किसी जीव की हिंसा नहीं करता, लेकिन दूसरे को हिंसा करने के लिए कहता है, तो वह भी हिंसा के दोष से नहीं बच सकता। इसी प्रकार किसी के द्वारा जीव की हत्या किए जाने पर प्रसन्न होना अथवा उसका समर्थन करना भी हिंसक भावना है। सच्चा अहिंसा धर्म वही है, जिसमें व्यक्ति के मन में किसी जीव के प्रति द्वेष न हो, वाणी में कठोरता न हो और व्यवहार में किसी को कष्ट पहुंचाने का भाव न हो। उन्होंने कहा कि धर्म का पालन केवल बड़े-बड़े अनुष्ठानों और धार्मिक आयोजनों तक सीमित नहीं होना चाहिए। धर्म की वास्तविक शुरुआत छोटे-छोटे संकल्पों से होती है। प्रत्येक श्रावक यह संकल्प ले कि वह अपनी इच्छा से किसी त्रस जीव की हिंसा नहीं करेगा, न किसी दूसरे से करवाएगा और न ही हिंसा का अनुमोदन करेगा। ऐसा संकल्प समाज में जीवदया, करुणा और संवेदनशीलता का वातावरण निर्मित कर सकता है।

अपने मन, वचन और काय तीनों को संयमित रखना चाहिए

आचार्यश्री ने प्रेरणा देते हुए कहा कि अहिंसा केवल सुनने और समझने का विषय नहीं, बल्कि जीवन में उतारने का धर्म है। जब व्यक्ति प्रत्येक जीव के अस्तित्व को समझते हुए उसके प्रति दया का भाव रखता है, तभी उसका श्रावक जीवन सार्थक होता है। संकल्पपूर्वक स्थूल हिंसा का त्याग आत्मकल्याण और अहिंसक जीवन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। मुनिश्री उपशांतसागरजी महाराज ने कहा कि अहिंसा का पालन केवल स्वयं किसी जीव को नहीं मारने से पूरा नहीं होता, बल्कि किसी दूसरे से हिंसा करवाना और हिंसा का अनुमोदन करना भी हिंसा ही है। व्यक्ति को अपने मन, वचन और काय तीनों को संयमित रखना चाहिए। प्रत्येक जीव अपने प्राणों को प्रिय मानता है, इसलिए हमें भी दूसरों के जीवन की रक्षा का भाव रखना चाहिए। गृहस्थ जीवन में रहते हुए कम से कम त्रस जीवों की संकल्पपूर्वक हिंसा का त्याग करना चाहिए। जीवों के प्रति दया, करुणा और मैत्री का भाव ही सच्चे जैन धर्म की पहचान है।