एटा। पुरानी बस्ती स्थित बड़े मंदिर जी में 21 अगस्त से आचार्य श्री नयन सागर जी महाराज के पावन सानिध्य एवं निर्देशन में पहली बार 24 तीर्थंकर विधान का शुभारंभ हुआ। प्रथम दिन श्री भक्तामर महामंडल विधान में प्रथम तीर्थंकर भगवान श्री आदिनाथ जी का गुणगान पद्मावती पुरवाल पंचायत कमेटी द्वारा हर्षोल्लासपूर्वक किया गया।

श्री अजितनाथ विधान में अर्घ्य समर्पण

द्वितीय दिवस श्री अजितनाथ विधान में श्री दिगंबर जैन वीर मंडल के पदाधिकारी एवं सदस्यों ने मंत्रोच्चारण के साथ मांडना पर श्रीफल समर्पित किए और इंद्रियों पर संयम रखने की भावना भायी।

इससे पूर्व प्रातः 6 बजे श्रीजी का अभिषेक एवं बड़ी शांतिधारा आचार्य श्री के सानिध्य तथा विधानाचार्य विपिन जैन स्वामी के निर्देशन में संपन्न हुई।

इंद्रियों पर विजय ही सच्ची जीत

जागृतकारी संत आचार्य श्री नयन सागर जी महाराज ने श्रावकों को संबोधित करते हुए कहा कि जैन धर्म के सभी 24 तीर्थंकरों के नाम सार्थक हैं। द्वितीय तीर्थंकर भगवान अजितनाथ ने तन, मन, इंद्रिय, विषय और कषाय की तमाम इच्छाओं पर विजय प्राप्त की, इसलिए वे ‘अजित’ कहलाए।

आचार्यश्री ने कहा कि आज पूरा जगत इंद्रियों का गुलाम है, जबकि भगवान अजितनाथ ने इंद्रियों की गुलामी नहीं की, बल्कि इंद्रियों को अपने चरणों में झुका लिया। आज लोग पदार्थ के पीछे भागते हैं, लेकिन पदार्थ उनके चरणों में स्वयं चलकर आते हैं।

रत्नत्रय से संभव है आत्मकल्याण

आचार्यश्री ने कहा कि शरीर के प्रति तीव्र राग भाव रहने के कारण हमें सम्यक दर्शन नहीं होता। रत्नत्रय से ही शरीर की पवित्रता संभव है। यदि हम भी थोड़ी-सी रत्नत्रय और संयम की साधना कर लें तो मानव जीवन सफल हो सकता है।

उन्होंने कहा कि मनुष्य अनादि काल से विषय-वासनाओं में फंसकर अपना अहित करता आया है। ‘पापी पेट का सवाल’ नहीं, बल्कि ‘पापी मन का सवाल’ है। पेट तो भर जाता है, लेकिन मन कभी नहीं भरता।

पांच इंद्रियों के उदाहरण से समझाया संयम

आचार्यश्री ने एक-एक इंद्रिय की गुलामी करने वाले प्राणियों के उदाहरण देते हुए कहा कि स्पर्शन इंद्रिय का दास बना हाथी हथिनी के कारण अपना जीवन गंवा देता है। रसना इंद्रिय के वशीभूत होकर मछली जाल में फंस जाती है। घ्राण यानी नासिका इंद्रिय के चक्कर में भंवरे के प्राण चले जाते हैं। चक्षु इंद्रिय के कारण पतंगा और कर्ण इंद्रिय के कारण मृग अपना जीवन समाप्त कर देता है।

उन्होंने कहा कि मनुष्य तो पांचों इंद्रियों का दास बन जाता है। आशा, तृष्णा और इच्छाएं इंसान को कभी चैन से नहीं बैठने देतीं।

आहार में शुद्धता और संयम

आचार्यश्री ने कहा कि किचन में ‘किच-किच’ होती है, जबकि शुद्ध आहार चौके में होता है। दिगंबर साधु आहार करके भी उपवास में रहते हैं, क्योंकि वे रस का आस्वादन नहीं करते और आहार के प्रति आसक्ति नहीं रखते।

पाद प्रक्षालन एवं शास्त्र भेंट

कार्यक्रम से पूर्व योगेश-मधु जैन एवं विपिन-अंशू जैन द्वारा पाद प्रक्षालन किया गया। पंचायत एवं वीर मंडल के पदाधिकारियों द्वारा शास्त्र भेंट किए गए।

दोपहर में आयोजित भक्तामर प्रशिक्षण शिविर में आचार्यश्री ने शिविरार्थियों से शुद्ध उच्चारण तथा काव्यों से संबंधित प्रश्न पूछे और भक्तामर स्तोत्र के अध्ययन को और अधिक प्रभावी बनाया।

गुरु भक्ति आरती एवं लकी ड्रा

शाम को संगीतमय सुंदर गुरु भक्ति आरती का आयोजन हुआ। इसके पश्चात श्री निर्मल वर्षायोग समिति के तत्वावधान में लकी ड्रा का पुरस्कार वितरण किया गया।

समाजजनों की सहभागिता

इस अवसर पर श्री शैलेन्द्र शैली, सुबोध अल्ला, रविन्द्र टीटू, सुनील जैन, प्रमोद जैन, उमेश उड़ेसर, धवल जैन, प्रियांक जैन, गौरव जैन अध्यक्ष वीर मंडल, राजकुमार राजू, मुन्ना कंपनी, संजय जैन, अतुल जैन, विनोद जैन, अनिल जैन, सतेन्द्र जैन, राहुल जैन, अनुज जैन, आशू जैन, अमित जैन, गौरव चौहान, कुलदीप जैन, पवन जैन, नितिन जैन, पंकज जैन, श्रीमती कांता जैन, राजकुमारी जैन, कल्पना जैन, रानी जैन, सुनीता जैन, रजनी जैन, बिंदु जैन, हर्षिता जैन, जूही जैन, रुबी जैन, पारुल एवं दीक्षा जैन सहित सैकड़ों श्रावक-श्राविकाएं मंदिर जी में उपस्थित रहे।

23 अगस्त को होगा संभवनाथ विधान

मीडिया प्रभारी बबिता जैन प्रेरणा ने बताया कि 23 अगस्त, रविवार को प्रातः 6 बजे से बड़े मंदिर जी में प्रभु के अभिषेक एवं शांतिधारा के पश्चात श्री नेमिनाथ महिला मंडल के तत्वावधान में ‘श्री संभवनाथ विधान’ आयोजित होगा। उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से समय पर मंदिर जी पहुंचकर धर्मलाभ लेने का आह्वान किया।