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सारांश:

इंदौर। श्रावक संस्कार शिविर एवं दशलक्षण पर्वराज पर्युषण महापर्व के आठवें दिन विद्या सुधा देशना मंडप में उत्तम त्याग धर्म की धर्मसभा आयोजित हुई। तीर्थ चक्रवर्ती मुनि श्री 108 सुधासागरजी महाराज ने जनसैलाब को संबोधित करते हुए त्याग धर्म का मर्म समझाया।

वस्तुओं से नहीं, आसक्ति से मुक्त हों

मुनि श्री ने कहा कि केवल वस्तुओं का त्याग करना पर्याप्त नहीं है। वस्तुओं के प्रति मोह, ममता और आसक्ति का त्याग करना आवश्यक है। संयोग संबंध को छोड़ने के लिए इच्छाओं का त्याग जरूरी है, जबकि अंतरंग संस्लेष संबंध को तोड़ने के लिए तप, साधना, भेद-विज्ञान और पूर्ण त्याग की आवश्यकता होती है।

उन्होंने कहा कि जिस प्रकार सोना भट्टी में तपकर पिघलता है, उसी प्रकार तपस्या से कर्मों की निर्जरा होती है, किंतु तप के बाद भी त्याग आवश्यक है। मुनि श्री ने कहा, “तप से अधिक कठिन त्याग है।”

उपकारी वस्तु का पहले दान करें

गृहस्थों को प्रेरणा देते हुए मुनि श्री ने कहा कि जो वस्तु उपकारी लगे, उसका पहले दान करें और उसके बाद स्वयं उपयोग करें। पूज्य साधु-संतों ने जिन उपकारी वस्तुओं का त्याग किया है, उनके लिए आहार, औषधि आदि का दान करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि जरूरतमंद, गरीब और असहाय लोगों की सहायता करना सच्चे त्याग और दान का स्वरूप है। “जो हेय है उसका त्याग करो, जो उपकारी है उसका दान करो और दान के बाद ही उसका भोग करो”—यही जीवन को सार्थक बनाने का मार्ग है।

गंधोदक प्रसंग ने भावविभोर किया

धर्मसभा में भावविभोर करने वाला प्रसंग देखने को मिला। मुनि श्री सुधासागरजी महाराज ने अपने करकमलों से सभी श्रावकों को गंधोदक प्रदान कर आशीर्वाद दिया। चक्रवर्ती अध्यक्ष नवीन गोधा ने भी मुनि श्री को गंधोदक अर्पित कर श्रद्धा एवं विनय प्रकट की। यह दृश्य समाजजनों के लिए हर्ष और गौरव का विषय रहा।

धर्मसभा में विशेष उपस्थिति

सामाजिक संसद अध्यक्ष आनंद गोधा, मनीष गोधा, सपना गोधा, आलोक, आकाश कोल, अशोक डोशी, हर्ष जैन, संजय पाटोदी, हुकुमचंद जैन काका, डॉ. जैनेन्द्र जैन, कमल जैन चैलेंजर, ब्रह्मचारी प्रदीप भैया, पारस भैया, विजय धुर्रा, राहुल सेठी एवं भूपेंद्र भोपाली सहित बड़ी संख्या में धर्मप्रेमी उपस्थित रहे।