इंदौर। श्रावक संस्कार शिविर के पांचवें दिन विद्या सुधा मंडप में उत्तम सत्य धर्म की व्याख्या करते हुए मुनिपुंगव श्री 108 सुधासागर जी महाराज ने कहा कि सत्य केवल बोलना नहीं, वस्तु के यथार्थ स्वरूप को जानना भी सत्य धर्म है। मनुष्य अपने बारे में निर्णय करने से पहले यह जाने कि उसका देव कैसा है, गुरु कैसा है और धर्म का वास्तविक स्वरूप क्या है। धर्म समाज प्रचारक एवं मीडिया प्रभारी राजेश जैन दद्दू ने बताया कि देशना में मुनि श्री ने कहा कि संसार में व्यक्ति अपने आराध्य को सच्चा मानता है, लेकिन जैन दर्शन में केवल मानने के बजाय गुणों और स्वरूप को जानने पर बल दिया गया है।

सत्य व्रत और सत्य धर्म में बताया अंतर

मुनि श्री ने कहा कि सत्य व्रत और सत्य धर्म के स्वरूप को समझना आवश्यक है। व्यवहार में झूठ न बोलना और अहिंसा की रक्षा करना सत्य व्रत से जुड़ा है, जबकि वस्तु के यथार्थ स्वरूप को समझना सत्य धर्म की ओर ले जाता है।

उन्होंने कहा, “मैं झूठ नहीं बोलूंगा” का संकल्प महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ यह जानना भी आवश्यक है कि सत्य वास्तव में है क्या?

वृक्ष के उदाहरण से समझाया वस्तु का यथार्थ स्वरूप

मुनि श्री ने वृक्ष का उदाहरण देते हुए कहा कि तना, शाखाएं, पत्ते और फूल दिखाई देते हैं, लेकिन इनमें से किसी एक को पूरा वृक्ष नहीं कहा जा सकता। इसी प्रकार द्रव्य, गुण और पर्याय को समझकर वस्तु के वास्तविक स्वभाव को पहचानना सत्य धर्म की गहरी दृष्टि है।

भगवान की पहचान नाम से नहीं, गुणों से

मुनि सुधासागर जी ने कहा कि जैन दर्शन आराध्य की पहचान उसके गुणों और स्वरूप से करने की प्रेरणा देता है। जैन दर्शन में सच्चे देव का स्वरूप अठारह दोषों से रहित, राग-द्वेष रहित और वीतराग बताया गया है।

उन्होंने कहा कि भगवान की पहचान केवल नाम और आकृति से नहीं, बल्कि उनके गुणों से होनी चाहिए। आराध्य के प्रति श्रद्धा इतनी दृढ़ हो कि जीवन की दिशा उसी आदर्श से निर्धारित हो।

गुरु की पहचान भीड़ से नहीं, त्याग और तप से

सच्चे गुरु की पहचान बताते हुए मुनि श्री ने कहा कि गुरु वही है जो स्वयं ज्ञान, ध्यान, तप, संयम और अहिंसा के मार्ग पर चले तथा साधक को मोक्षमार्ग की दिशा दिखाए।

उन्होंने कहा कि गुरु का मूल्य भीड़ या प्रसिद्धि के आधार पर नहीं, बल्कि उसके त्याग, तप और आचरण से समझना चाहिए। मार्गदर्शक की दिशा सही होगी तो शिष्य भी सही दिशा में आगे बढ़ सकेगा।

‘दोष गिनाकर नहीं, सही दिशा देकर सुधारें’

मुनि श्री ने कहा कि किसी व्यक्ति को बार-बार उसके दोष और गलतियां बताकर उसे तोड़ने के बजाय उसके सामने सही आदर्श और दिशा रखनी चाहिए। वर्तमान जीवन में कमियां हो सकती हैं, लेकिन यदि व्यक्ति का आदर्श और दिशा सही है तो उसमें परिवर्तन की संभावना बनी रहती है।

उन्होंने श्रद्धालुओं को सच्चे देव, शास्त्र और गुरु की पहचान के आधार पर सम्यक दर्शन की नींव मजबूत करने की प्रेरणा दी।

मुनि श्री के पांच प्रमुख संदेश

1. पहले भगवान को जानो, फिर मानो।

2. सत्य केवल बोलना नहीं, यथार्थ को जानना भी है।

3. सच्चे गुरु की पहचान ज्ञान, तप और संयम से करो।

4. किसी के दोष गिनाकर उसे मत तोड़ो, उसकी दिशा को सही करने का प्रयास करो।

5. सम्यक दर्शन की नींव सच्चे देव, शास्त्र और गुरु की पहचान है।

धर्मसभा में सपना-मनीष गोधा, अध्यक्ष नवीन गोधा, आनंद गोधा, अशोक डोशी, हर्ष जैन, डॉ. जैनेन्द्र जैन, हुकम काका, संजय पाटोदी, श्रुत जैन, भूपेंद्र जैन, विजय धुर्रा, अक्षय कासलीवाल, राहुल स्पोर्ट्स सहित बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे।