दिल्ली(ऋषभोदय)। पर्वराज पर्युषण महापर्व पर “श्रावक संस्कार संयम शिविर में क्षमा धर्म पर पट्टाचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज ने कहा कि वास्तविक पर्व वही है जो आत्मा को पवित्र करे। जो कल्याण का पुण्य प्रदर्शित करे, पुण्य कार्य में प्रेरित करे, वही पुण्य वर्धक पर्व कहलाते हैं। पर्व नवीन ऊर्जा प्रदान करते हैं। क्षमा अमृत है, क्षमा शांति का परम द्वार है। क्षमा नीर है, क्रोध महा अग्नि है, अग्नि में कोई नहीं झुलसना चाहता है। क्रोधी के सगे-संबंधी भी उसे छोड़ देते हैं। क्रोध से बचो, क्षमा धारण करो। क्रोधी, मानी, मायाचारी व्यर्थ व्यक्ति मृतक सड़े पशु के समान होता है। सिर छिपी होती है तो वह धूप से बचाती है। ऐसे ही जिसके सिर पर गुरु का आशीष होता है वह पापों से बच जाता है। वे परिणाम श्रेष्ठ हैं जो अन्याय से बचा लें, क्रोध से बचा लें, पाप से बचा लें।
अर्थ धन ही अनर्थ की जड़
आचार्य श्री ने कहा कि क्रोध चण्ड है, मान चण्ड है। उनके पास श्वान भी खड़ा नहीं होता है। अर्थ ही अनर्थ कराता है। जो जितना जोड़ेगा उतना ही अशान्ति में रहेगा। जितने भी अनर्थ हो रहे हैं, जितने भी अनर्थ हुए हैं और जितने अनर्थ होंगे, वे सब अर्थ (धन) के कारण ही हुए हैं, हो रहे हैं। जो दया, करुणा से युक्त है, वही धर्म होता है। कोई मारो नहीं, परन्तु इसलिए आत्मा को दया से मुक्त नहीं किया जा सकता। जो दयाशील ही होते हैं, वह करुणा को जानकर जीवन का जीवन जीना कर होता है। क्षमा महान है। क्षमा धर्म है। क्षमा स्वभाव है। क्षमा दण्ड से क्षमा। क्षमा वीरों का आभूषण है। क्षमा शत्रुओं का नाश है। क्षमा करनी चाहिए। क्षमा वीरों का भूषण है। जो क्षमा धारण करता है, वही वीर कहलाता है। क्षमा करने में भी क्षमा मानना चाहिए। पंचेन्द्रिय सहित जो धर्म है, वही सच्चा धर्म है। पाप क्षय, परस्पर सहित, औरों के द्वारा होने वाले दुःख का नाश, पंचेन्द्रिय से... होता है। जो सर्वथा, हितोपदेश, शील-संयम, तपस्या में सहायक हो, और परस्पर प्रेम बढ़ाता है, वह पंचाचार्य धर्म है। धर्म में पाप नहीं, धर्म में पाप होता नहीं।




