दिल्ली। दिगंबर जैन पट्टाचार्य श्रीविशुद्धसागर जी गुरुदेव ने दिल्ली में धर्म सभा में संबोधन करते हुए कहा कि क्रोध आग है। क्षमा शीतल नीर है। क्षमा वीरों का आभूषण है। क्षमा सज्जनों की कुल विद्या है। जब-जब कलुषित परिणाम हो, जब-जब कषाय-भाव हो, जब-जब अहंकार आए तब-तब क्षमा धारण कर लेना। जब गर्म दुग्ध में उफान आता है तो पानी के छींटे डालने पर वह शांत हो जाता है। ऐसे ही जब-जब क्रोध कषाय उग्र हो, कषाय भड़के तो क्षमा के नीर से उसे शांत करें। क्रोध महा ज्वाला है, क्षमा अमृत है। क्षमा में आनंद है, क्षमा में शांति है, क्षमा में सुख है।
क्षमाशील सर्व श्रेष्ठ होता है
क्षमा महा शक्ति है, जो क्षमा धारण करता है वह शक्तिशाली होता है। तपस्वी जनों के पहले यदि किसी का स्थान आता है तो वह क्षमाशील का ही आता है। क्षमा बुक्ति की सीढ़ी है। क्षमा ही अहिंसा है। क्षमा अपरिग्रह है। क्षमा धर्म है। क्षमा स्वभाव है। क्षमा मांगने और क्षमा करने से ही घर, समाज देश एवं विश्व में शांति संभव है। क्षमा सर्व-प्राणियों के लिए उपकारी है। क्षमा वात्सल्य का अंग है। क्षमा ही धर्म का आधार है। क्षमा आंतरिक शांति, सुकून व आनंद प्रदान करता है। समा महा नीति है, जो मुक्ति का साधन है।



