बड़े जैन मंदिर में पांच माह तक धर्म प्रभावना करने के बाद रविवार को अंतिम दिन मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि सांसारिक प्राणी संसार में रहते हुए, सांसारिक कार्यों में ही लिप्त रहता है। राग द्वेष मान माया लोभ के चक्कर में वह आत्म साधना करना भूल जाता है। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर...
मुरैना। बड़े जैन मंदिर में पांच माह तक धर्म प्रभावना करने के बाद रविवार को अंतिम दिन मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि सांसारिक प्राणी संसार में रहते हुए, सांसारिक कार्यों में ही लिप्त रहता है। राग द्वेष मान माया लोभ के चक्कर में वह आत्म साधना करना भूल जाता है जबकि, होना यह चाहिए कि संसार में रहते हुए, सांसारिक क्रियाओं के मध्य ही हमें धीरे-धीरे संयम की साधना का अभ्यास करते रहना चाहिए। एक छोटा सा संयम का नियम मनुष्य की जिंदगी बदल सकता है। छोटे-छोटे नियमों का नित्य पालन करने से हमारा आत्मबल मजबूत होता है और हमें संयम पथ पर चलने में मदद मिलती है। बूंद-बूंद से घड़ा भरता है, इसी तरह संयम की साधना के मार्ग पर बढ़ने के लिए शुरू से ही अपनी सामर्थ्य अनुसार शनै-शनै नियम पूर्वक पालन करना चाहिए। संयम की साधना में नियमों का महत्व इसलिए है क्योंकि वे व्यक्ति को अनुशासन, आत्म-नियंत्रण और आत्म-जागरूकता प्रदान करते हैं।नियम व्यक्ति में अनुशासन की भावना पैदा करते हैं
मुनिश्री ने कहा कि नियम, संयम को आकार देते हैं और जीवन के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करते हैं। नियमों के पालन से व्यक्ति काम, क्रोध, लोभ जैसे विकारों को नियंत्रित कर पाता है, जिससे मन शुद्ध होता है, एकाग्रता बढ़ती है और जीवन में सफलता तथा संतुष्टि मिलती है। नियम व्यक्ति में अनुशासन की भावना पैदा करते हैं, जो संयम के लिए आवश्यक है। यह व्यक्ति को अपनी इंद्रियों और इच्छाओं पर नियंत्रण रखने में मदद करते हैं। नियम किसी भी महान उद्देश्य की ओर अग्रसर होने के लिए एक माध्यम और आधार प्रदान करते हैं। नियमों का पालन करने से काम, क्रोध, लोभ और अन्य नकारात्मक विचारों पर विजय प्राप्त करने में मदद मिलती है, जो संयम की साधना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
सल्लेखना पूर्वक समाधि मरण का होना चाहिएइस अवसर पर जैन संत मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज ने कहा कि जीवन का मुख्य उद्देश्य सल्लेखना पूर्वक समाधि मरण का होना चाहिए। गृहस्थ हो या महावृती, उसकी भावना हो कि हमारा अंतिम समय रागदेश रहित, समता धारण कर इस नश्वर शरीर को छोड़ समाधि हो। नियम के साथ यदि हम धीरे-धीरे चारों प्रकार के आहार का त्याग करते हुए उत्कृष्ट समाधि की ओर बढ़े। अपने इस शरीर को छोड़ने के पहले समता पूर्वक रागदेश कषाय आदि को छोड़कर समाधि पूर्वक मरण को प्राप्त करना चाहिए।
मुनिराजों ने धौलपुर की ओर किया मंगल विहारनगर में पांच माह तक धर्म प्रभावना के बाद मुनिराजों ने रविवार को दोपहर 2 बजे धौलपुर की ओर मंगल पद विहार किया। रात्रि विश्राम ज्ञानतीर्थ मुरैना में होगा। सोमवार की आहारचर्या ज्ञानतीर्थ में होगी। दोपहर 2 बजे विहार के बाद रात्रि विश्राम सरायछोला में होने की संभावना है। मंगलवार 25 नवंबर को प्रातःकालीन बेला में धौलपुर नगर में मुनिराजों का भव्य मंगल प्रवेश होगा।




