कुण्डलपुर(म.प्र.)। दशलक्षण महापर्व के शुभारंभ के साथ ही कुण्डलपुर सिद्धक्षेत्र में धर्म, साधना और संस्कारों का वातावरण निर्मित हो गया है। बड़े बाबा भगवान श्री आदिनाथ की साधनामय भूमि पर निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज के ससंघ सान्निध्य में श्रावक संस्कार शिविर में देश के विभिन्न क्षेत्रों से लगभग 1200 श्रद्धालु सहभागी होकर दस दिवसीय साधना का लाभ ले रहे हैं। उत्तम क्षमा धर्म के प्रथम दिन मुनि श्री ने कहा कि दशलक्षण किसी व्यक्ति, घटना अथवा स्थान विशेष से बंधा पर्व नहीं, बल्कि विशुद्ध आत्मआराधना का पर्व है। इन दस धर्मों की आराधना वास्तव में आत्मा के सात्विक गुणों की आराधना है। मुनि श्री ने कहा कि जैसे बीमारी किसी समुदाय विशेष की नहीं होती और उसे दूर करने वाली औषधि भी किसी एक समुदाय की नहीं होती, उसी प्रकार राग, द्वेष, मोह, क्रोध, मान, माया, लोभ, अशांति, विषमता और दुर्भावना जैसी विकृतियां भी किसी वर्ग विशेष की नहीं हैं। जहां ये विकार हैं, वहां शांति, समता और सद्भावना की आवश्यकता है। स्वभाव भावों का धर्म इन विभाव भावों को दूर करने वाली परम औषधि के समान है। शांति, समता और सद्भावना हमारे मूल स्वभाव हैं, लेकिन वर्तमान में मनुष्य अशांति, विषमता और दुर्भावना में जी रहा है। दशलक्षण पर्व हमें पुनः अपने स्वभाव में लौटने की प्रेरणा देता है।

जीवन की समस्याओं के समाधान का व्यावहारिक मार्गदर्शन भी देता है

उन्होंने कहा कि इस यात्रा का पहला चरण आत्मा के प्रति अभिरुचि जगाना है। इसके बाद आत्मनिरीक्षण, आत्ममंथन और अंततः आत्मोपलब्धि की स्थिति आती है। आत्म अभिरुचि, आत्मनिरीक्षण, आत्ममंथन और आत्मोपलब्धि-ये क्रमिक सौपान दशलक्षण की साधना को बाहरी क्रियाओं से उठाकर आत्मानुभूति की ओर ले जाते हैं। मुनि श्री ने जैन दर्शन के प्रमुख ग्रंथ तत्त्वार्थसूत्र का उल्लेख करते हुए कहा कि यह केवल दर्शन और सिद्धांतों का ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन की समस्याओं के समाधान का व्यावहारिक मार्गदर्शन भी देता है। इसका पहला सूत्र-सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः-जीवन की दिशा निर्धारित करने वाला महत्वपूर्ण सूत्र है। सही दृष्टिकोण सम्यक दर्शन, सही समझ सम्यक ज्ञान और सही को चुनकर उसके अनुरूप आचरण करना सम्यक चारित्र है। यही रत्नत्रय मोक्षमार्ग का आधार है और गृहस्थ के जीवन में भी सफलता, निर्णय और लक्ष्य की पूर्ति के लिए व्यवहारिक दिशा प्रदान करता है।

छोटा-सा अंतराल चेतना के जागरण का अवसर

क्षमा धर्म की साधना को व्यवहार से जोड़ते हुए उन्होंने कहा कि भगवान और गुरु के सामने क्रोध को जीत लेना आसान है, लेकिन वास्तविक परीक्षा तब होती है जब कोई अप्रिय व्यवहार करे या विपरीत परिस्थिति सामने आए। यदि किसी के व्यवहार से मन में प्रतिक्रिया उत्पन्न होने के बाद व्यक्ति एक क्षण रुककर स्वयं को संभाल ले, तो यही क्षमा और समता की सच्ची साधना है।उन्होंने कहा कि परिस्थिति और प्रतिक्रिया के बीच मिलने वाला छोटा-सा अंतराल चेतना के जागरण का अवसर है। मनुष्य की विशेषता यही है कि वह प्रतिक्रिया देने से पहले रुककर सोच सकता है। पशु सामने आई परिस्थिति पर तत्काल प्रतिक्रिया करता है, जबकि मनुष्य विवेक से निर्णय ले सकता है। जो व्यक्ति उस क्षण सजग हो जाता है, वह अपने परिणामों को संभाल लेता है; जो प्रमाद करता है, वह परिस्थितियों से प्रभावित होकर उसी के अनुरूप ढल जाता है।

क्षमा धर्म का संकल्प केवल एक दिन के लिए नहीं हो

मुनि श्री ने कहा कि अशांति का कारण हमेशा बाहर खोजने की हमारी आदत है। व्यक्ति पड़ोसी, परिवार, मोबाइल अथवा किसी अन्य परिस्थिति को अपनी अशांति का कारण मान लेता है, जबकि वास्तविक कारण उसके अपने परिणाम होते हैं। यदि बाहरी व्यक्ति ही हमारे भावों को नियंत्रित करने लगे तो हमारी स्वतंत्रता समाप्त हो जाएगी। जैन दर्शन के अनुसार बाहरी निमित्त चाहे जैसा हो, जब तक हमारा उपादान उससे प्रभावित नहीं होता, तब तक कोई निमित्त हमारे परिणामों को बिगाड़ नहीं सकता। इसलिए विपरीत परिस्थितियों में भी अपने स्वभाव में स्थिर रहना ही आत्मसाधना है। उन्होंने शिविरार्थियों से कहा कि क्षमा धर्म का संकल्प केवल एक दिन के लिए नहीं होना चाहिए। आज क्रोध नहीं करना है, बल्कि दसों दिन इसका अभ्यास करते हुए इसे जीवन का संस्कार बनाना है। क्रोध आए तो उसे लंबा न खींचें और शीघ्र समाप्त करें। एक परिस्थिति की प्रतिक्रिया दूसरी परिस्थिति तक न ले जाएं। अपने समता भाव को किसी दूसरे के व्यवहार से बाधित न होने दें।

अनुशासन और संयम के साथ साधना में सहभागी बनें

मुनि श्री ने शिविर की व्यवस्थाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रातःकालीन बेला में मंगल ध्वनि, योग-प्राणायाम, ध्वजारोहण, मंडप उद्घाटन, अभिषेक और शांतिधारा सहित दिनचर्या में धर्म और संस्कार का सुंदर समन्वय दिखाई दे रहा है। उन्होंने कार्यकर्ताओं से शिविरार्थियों की सुविधा, सम्मान और सहयोग का विशेष ध्यान रखने का आह्वान किया। साथ ही शिविरार्थियों को भी स्मरण कराया कि वे बाराती बनकर नहीं, शिविरार्थी बनकर आए हैं, इसलिए अनुशासन और संयम के साथ साधना में सहभागी बनें। व्यवस्थाओं में कहीं कमी रह जाए तो क्षमा और समता का परिचय दें तथा अपनी आवश्यकता विनम्रता से रखें। उन्होंने कहा कि कुण्डलपुर बड़े बाबा की साधनामय भूमि और गुरुवर आचार्य श्री विद्यासागर महाराज की साधना स्थली है। ऐसी पवित्र भूमि पर चातुर्मास और संस्कार शिविर में सम्मिलित होना सभी का सौभाग्य है। आचार्य श्री समयसागर जी महाराज का मार्गदर्शन तथा साधु-संघ का सान्निध्य इस आयोजन को धर्मप्रभावना की दिशा दे रहा है।

1200 श्रद्धालु धर्म, संयम और संस्कार साधना का लाभ लेंगे

राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं कुण्डलपुर क्षेत्र प्रचार मंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ ने बताया कि शिविर में देश के विभिन्न क्षेत्रों से लगभग 1200 श्रद्धालु धर्म, संयम और संस्कार साधना का लाभ लेने कुण्डलपुर पहुंचे हैं। ब्र. धीरज भैया राहतगढ़, संघस्थ अनूप भैया विदिशा, रिंकू भैया, गोल्डी सिंघई,पारस भैया अमरावती, सुबोध भुसावल, सनी कटनी,शैलेष दमोह सहित समता सरोवर की टीम शिविर संचालन में पूर्ण सहयोग प्रदान कर रही है। कुण्डलपुर क्षेत्र कमेटी, चातुर्मास समिति व्यवस्थाओं में संलग्न हैं। प्रातःकालीन बेला में पर्व की पूजा ऐलक निश्चयसागर महाराज के निर्देशन में संपन्न हुई।