मुरैना। साधु-संतों और गुरुओं का उपकार जीवन में कभी नहीं भूलना चाहिए। वे स्वयं के आत्मकल्याण के साथ-साथ प्राणीमात्र के कल्याण की भावना रखते हैं। उनका जीवन त्याग, संयम, तप और आत्मसाधना का प्रतीक होता है। इसलिए हमें उनके प्रति सदैव श्रद्धा, विनय और कृतज्ञता का भाव रखना चाहिए। यह उद्गार चातुर्मासरत आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज ने श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि किसी साधु-संत या गुरु की बुराई अथवा निंदा करना श्रावक के लिए उचित नहीं है। यदि कभी किसी साधु के आचरण में कोई कमी दिखाई भी दे तो उसके प्रचार-प्रसार अथवा निंदा करने के स्थान पर मौन धारण करना ही श्रेष्ठ है। जैन दर्शन में आत्म कल्याण का मार्ग सम्यग्दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र से होकर गुजरता है।
संयमित जीवन स्वयं में कल्याणकारी प्रेरणा देते हैं।
आचार्यश्री ने कहा कि साधु का जीवन इसी आत्मसाधना और संयम की चर्या का आदर्श प्रस्तुत करता है। हमें दूसरों के दोष देखने के बजाय अपने भीतर झांकना चाहिए। यदि किसी साधु के व्यवहार में कोई ऐसी बात दिखाई देती है जिसे हम उचित नहीं मानते, तो उसके दोषों की चर्चा करने के बजाय यह भावना करनी चाहिए कि जब मुझे साधु बनने का अवसर मिलेगा। तब मैं ऐसी भूल कभी नहीं करूंगा। उन्होंने कहा कि साधु की मुद्रा, वेश और संयमित जीवन स्वयं में कल्याणकारी प्रेरणा देते हैं। जिसने संसार के भोगों का त्याग कर आत्मकल्याण का मार्ग अपनाया है, उसके प्रति श्रद्धा रखना हमारा कर्तव्य है। गुणग्राही दृष्टि रखने वाला व्यक्ति दूसरों के दोषों में भी अपने लिए सीख खोज लेता है, जबकि दोषदर्शी व्यक्ति गुणों के सामने भी दोष ही खोजता रहता है।
गुरु के प्रति श्रद्धा का अर्थ केवल पूजा या वंदना नहीं
आचार्यश्री ने कहा कि गुरु केवल उपदेश देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि आत्मा को जागृत करने वाला मार्गदर्शक होता है। गुरु के प्रति श्रद्धा का अर्थ केवल पूजा या वंदना करना नहीं, बल्कि उनके द्वारा बताए गए मार्ग पर चलना है। यदि हम गुरु के चरणों में श्रद्धा रखते हैं, तो उनके उपदेशों को अपने जीवन में उतारना भी आवश्यक है।
प्रत्येक प्राणी अपने कर्मों के अनुसार जीवन जी रहा है - मुनिश्री उपशांत सागर जी
मुनिश्री उपशांत सागर जी ने धर्मसभा में कहा कि साधु-संतों के गुणों को ग्रहण करना ही सच्ची गुरु-भक्ति है। किसी के दोषों की चर्चा करने से अपना कोई कल्याण नहीं होता, लेकिन किसी के गुणों को अपनाने से आत्मा का विकास अवश्य होता है। इसलिए मन में निंदा के स्थान पर विनय, ईर्ष्या के स्थान पर प्रशंसा और दोष-दर्शन के स्थान पर गुण-दर्शन की भावना विकसित करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि संसार में प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्मों के अनुसार जीवन जी रहा है।
अहिंसा, संयम, त्याग और आत्मशुद्धि के मार्ग पर आगे बढ़ें
जैन दर्शन हमें किसी दूसरे के कर्मों का निर्णायक बनने के बजाय अपने कर्मों और अपने परिणामों को सुधारने की प्रेरणा देता है। जो व्यक्ति अपने भीतर के विकारों को जीतने का प्रयास करता है, वही वास्तविक अर्थों में धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ता है। मुनिश्री ने श्रावकों से आह्वान किया कि वे साधु-संतों के प्रति श्रद्धा और वात्सल्य का भाव रखें, उनके गुणों को अपने जीवन में उतारें तथा गुरु द्वारा बताए गए अहिंसा, संयम, त्याग और आत्मशुद्धि के मार्ग पर आगे बढ़ें। यही गुरु के प्रति सच्ची श्रद्धा और साधु-संतों के प्रति वास्तविक विनय है।
कल मनाया जाएगा भगवान पार्श्वनाथ स्वामी का मोक्ष कल्याणक
बड़ा जैन मंदिर कमेटी के ऑडिटर डॉ. मनोज जैन ने बताया कि बुधवार 19 अगस्त को जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ स्वामी का मोक्ष कल्याणक महोत्सव बड़े जैन मंदिर में आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज ससंघ के सान्निध्य एवं मुनिश्री उपशांत सागर महाराज के निर्देशन में निवार्ण लाडू अर्पित किया जाएगा। इस अवसर प्रातः 7 बजे श्री पार्श्वनाथ स्वामी का जलाभिषेक, वृहद शांतिधारा एवं विशेष पूजन किया जाएगा। प्रातः 8.15 पर आचार्यश्री एवं मुनिश्री के प्रवचन होगे और 9.30 बजे मोक्ष लक्ष्मी की कामना के साथ निर्वाण कांड का वाचन करते हुए निर्वाण लाडू अर्पित किया जाएगा।




