धारियावद। दशलक्षण महापर्व की आराधना नगर में भक्ति, तप और त्याग की भावना के साथ जारी है। महावीर मंदिर एवं महावीर वाटिका स्थित पुण्यसागर सभागार में परम पूज्य आचार्य कल्पपुण्यसागरजी महाराज ससंघ के पावन सान्निध्य में बुधवार को पर्व के आठवें दिन उत्तम त्याग धर्म की श्रद्धा एवं भक्तिभावपूर्वक आराधना की गई।
अभिषेक, पूजन और विधान
प्रातः मूलनायक भगवान महावीर स्वामी का पंचामृत अभिषेक एवं शांतिधारा संपन्न हुई। इसके बाद श्रावक-श्राविकाओं ने देव-शास्त्र-गुरु पूजन, सोलहकारण पूजन, दशलक्षण पर्व पूजन, अनंतनाथ व्रत पूजन तथा जम्बूद्वीप महामंडल विधान भक्ति भाव से संपन्न किया। पुण्यसागर सभागार पूरे समय धार्मिक वातावरण से गूंजता रहा।
जोड़ने के साथ छोड़ना भी जरूरी
प्रवचन श्रृंखला में आचार्य कल्पपुण्यसागरजी महाराज ने उत्तम त्याग धर्म की महत्ता बताते हुए कहा कि जीवन में जोड़ने के साथ छोड़ना भी आवश्यक है। जैसे श्वास लेने के साथ उसे बाहर छोड़ना और भोजन के बाद शरीर से अनावश्यक पदार्थ का निष्कासन जरूरी है, उसी प्रकार जीवन के संतुलन के लिए त्याग भी आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि बचपन से व्यक्ति वस्तुओं, संबंधों और धन-संपत्ति को जोड़ता जाता है, लेकिन उन्हें छोड़ना नहीं सीखता। यही आसक्ति बंधन का कारण बनती है। जिन्होंने सब कुछ छोड़ा, उन्होंने ही वास्तविक उपलब्धि प्राप्त की।
दान में मान की अपेक्षा न रखें
आचार्यश्री ने कहा कि कमाने के साथ धन का सदुपयोग और दान करना भी सीखना चाहिए। देने से कभी कमी नहीं आती; इसके विपरीत जीवन में निर्मलता और सार्थकता आती है। दान करते समय मान-सम्मान अथवा प्रचार की अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए। न जताना है, न बताना है—देना ही आनंद है।
उन्होंने कहा कि धन-संपत्ति को केवल संग्रह कर रखने से वह यहीं रह जाती है, लेकिन उसे धर्म, समाज और जनहित के कार्यों में लगाने से पुण्य का संचय होता है। निर्मल भाव से किया गया त्याग जीवन को सुखी, संपन्न और सार्थक बनाते हुए मोक्ष मार्ग प्रशस्त करता है।
श्रीफल साथी : अशोक कुमार जेतावत




