धारियावद। दशलक्षण महापर्व के अंतर्गत रविवार को उत्तम सत्य धर्म का दिवस श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक भावनाओं के साथ मनाया गया। प्रातः भगवान का पंचामृत अभिषेक एवं शांतिधारा की गई। इसके बाद नित्य-नियम पूजन और पर्व पूजन के माध्यम से श्रद्धालुओं ने धर्म आराधना की।

पुण्यसागर सभागार में चल रहे जम्बूद्वीप महामंडल विधान में श्रावक-श्राविकाओं ने भक्तिभाव से अर्घ्य समर्पित किए।

‘सत्य को उसके वास्तविक स्वरूप में स्वीकार करें’

धर्मसभा में आचार्य कल्पपुण्यसागर जी महाराज ने कहा कि केवल सत्य बोलना ही सत्य धर्म नहीं है, बल्कि सत्य को समझना, मानना और उसके वास्तविक स्वरूप में स्वीकार करना भी उत्तम सत्य धर्म है।

उन्होंने कहा कि जिस पदार्थ का जो वास्तविक स्वरूप है, उसे उसी रूप में स्वीकार करना और समझना सत्य धर्म की सार्थकता है। सत्य को केवल वाणी तक सीमित नहीं रखकर दृष्टि और आचरण में भी उतारना चाहिए।

‘आत्मस्वरूप सत्य को पहचानने का प्रयास करें’

आचार्य श्री ने कहा कि सत्य आत्मा का स्वभाव है। संसार के अन्य पदार्थ नाशवान हैं, इसलिए व्यक्ति को अपने जीवन में आत्मस्वरूप को पहचानने और समझने का प्रयास करना चाहिए।

उन्होंने श्रद्धालुओं को बाहरी आकर्षण और अस्थायी वस्तुओं से आगे बढ़कर आत्मचिंतन एवं आत्मकल्याण की दिशा में पुरुषार्थ करने की प्रेरणा दी।

सत्य के साथ विवेक और करुणा भी जरूरी

आचार्य श्री ने कहा कि ऐसा सत्य भी नहीं बोलना चाहिए, जिससे सामने वाले व्यक्ति के हृदय को अनावश्यक ठेस पहुंचे अथवा वह संकट या परेशानी में पड़ जाए। सत्य के साथ विवेक, करुणा और जीवहित की भावना का होना भी आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि सत्य धर्म का अर्थ केवल तथ्य कहना नहीं, बल्कि अपनी वाणी और व्यवहार में अहिंसा तथा संवेदनशीलता को भी स्थान देना है।

‘असत्य कुछ समय टिक सकता है, सत्य स्थायी रहता है’

आचार्य कल्पपुण्यसागर जी ने कहा कि जिस व्यक्ति के जीवन में सत्य धर्म प्रतिष्ठित हो जाता है, उसका जीवन सहजता की ओर बढ़ता है। असत्य कुछ समय के लिए परिस्थितियों को प्रभावित कर सकता है, लेकिन अंततः सत्य ही स्थायी रहता है।

उन्होंने श्रद्धालुओं को दशलक्षण महापर्व में सत्य धर्म को केवल पूजन और विधान तक सीमित न रखकर दैनिक जीवन के विचार, वाणी और व्यवहार में उतारने की प्रेरणा दी।