धामनोद। पर्वराज पर्युषण के नौवें दिन उत्तम आकिंचन्य धर्म की श्रद्धापूर्वक आराधना की गई। आचार्य श्री 108 सुनीलसागरजी महाराज की शिष्या आर्यिका सुप्रज्ञमति माताजी ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि आकिंचन्य धर्म का सार है—परिग्रह और ‘मेरा-मेरा’ के भाव का त्याग।
आत्मा के सिवाय कुछ भी अपना नहीं
माताजी ने कहा कि धन, दौलत, ऐश्वर्य, नाम, संबंधी, माता-पिता, बच्चे और पत्नी सहित शरीर भी स्थायी रूप से अपना नहीं है। शरीर भी किराए के मकान के समान है; वास्तविक रूप से अपना केवल चेतन आत्मा है।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति जीवनभर धन के संग्रह में लगा रहता है, किंतु धन का सदुपयोग दान और धर्मकार्यों में करना चाहिए। बच्चों के लिए कितना और क्या छोड़कर जाएंगे, इसका मोह छोड़कर अपने जीवन को पूजा, साधना और संत-सेवा से जोड़ना आवश्यक है।
परिग्रह बढ़ने से बढ़ती है अशांति
आर्यिका सुप्रज्ञमति माताजी ने आचार्य आदिसागरजी के जीवन से जुड़ा दृष्टांत सुनाते हुए बताया कि जिन्होंने संसार की नश्वरता को समझा, उन्होंने ममता के बंधन से मुक्त होकर धर्ममार्ग अपनाया। उन्होंने एक साधु की लंगोटी का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि छोटी-सी वस्तु का परिग्रह भी धीरे-धीरे बढ़ सकता है। इसलिए जैन साधु किसी से कुछ मांगते नहीं हैं।
उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि जो व्यक्ति पूजा और साधु-संत सेवा से रोकता है, वह धर्ममार्ग में बाधा उत्पन्न करता है। जीवन में ‘मेरा-तेरा’ का भाव जितना कम होगा, मन उतना ही शांत और आत्मा उतनी ही निर्मल होगी।
दो श्राविकाओं की दस उपवास साधना
दशलक्षण पर्व में समाज की दो बहुएं स्वाति राजेश गोधा और अदिति गौरव काला दस-दस उपवास की तप आराधना कर रही हैं। समाजजनों ने दोनों तपस्वी श्राविकाओं की साधना की अनुमोदना करते हुए बधाई दी। उनका पारणा पूर्णिमा के दिन प्रातः होगा।
अनंत चतुर्दशी पर निकलेगी शोभायात्रा
25 सितंबर को अनंत चतुर्दशी के अवसर पर नियमित धार्मिक क्रियाओं के बाद शाम को नगर के मुख्य मार्गों पर भगवान की शोभायात्रा निकाली जाएगी। भगवान का अभिषेक, शांतिधारा और आरती संपन्न होगी तथा दशलक्षण धर्म की माला की बोली भी लगाई जाएगी।
श्रीफल साथी : दीपक प्रधान, धामनोद




