दिल्ली, 24 सितंबर। ऋषभविहार में विराजमान पट्टाचार्य श्री 108 विशुद्धसागरजी गुरुदेव ने श्रावक संस्कार शिविर की धर्मसभा में जैन समाज को संबोधित करते हुए उत्तम आकिंचन्य धर्म की व्याख्या की।
उन्होंने कहा कि संयमी साधक जब क्रोध, मान, माया और लोभ को छोड़कर क्षमा, मार्दव, आर्जव एवं शौच धर्म धारण करता है तथा सत्य, संयम, तप और त्याग को जीवन में उतारता है, तब उसके भीतर आकिंचन्य धर्म प्रकट होता है। धर्म ही यथार्थ सुख, शांति, मंगल और शरण का साधन है।
परमाणु मात्र भी मेरा नहीं
पट्टाचार्यश्री ने कहा कि अन्य परमाणु मात्र भी मेरा नहीं है—ऐसा भाव ही वास्तविक आकिंचन्य धर्म है। पर को अपना मानना परिग्रह है। दूसरों के अधिकार को अपना समझना और दूसरों को अपना बनाने का विचार मिथ्या है।
उन्होंने कहा कि निज में निज का भाव ही आकिंचन्य भाव है। धन, धरती, भवन, वाहन, संबंधी और शरीर भी स्थायी रूप से अपने नहीं हैं। कोई वस्तु साथ नहीं आई और न ही साथ जाएगी; शरीर भी यहीं छूट जाएगा।
आत्मा और देह का भेद
गुरुदेव ने कहा कि जीव अकेला जन्म लेता है और अकेला ही मृत्यु को प्राप्त होता है। इसलिए उसे आत्मा और परद्रव्य के भेद को समझना चाहिए। मनुष्य राग और मोह से जगत को अपना कह सकता है, किंतु उसे वास्तविक रूप से अपना बना नहीं सकता।
उन्होंने कहा—“मैं चेतन हूं, जड़ अचेतन हूं; मैं शाश्वत हूं, देह नश्वर है; मैं ज्ञानस्वभावी हूं।” आत्मा का स्वभाव जगत के समस्त पुद्गलों और परद्रव्यों से अत्यंत भिन्न है। इस भेद-विज्ञान की अनुभूति ही आत्मकल्याण की दिशा है।
श्रीफल साथी : अभिषेक अशोक पाटील




