दिल्ली। छोटा बाजार में श्रमण संस्कृति के उन्नायक दिगंबर जैन पट्टाचार्य श्री 108 विशुद्धसागरजी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि संयम, त्याग और संन्यास के मार्ग पर चलने के लिए राग एवं द्वेष का त्याग करना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि अपनों के प्रति अत्यधिक राग और दूसरों के प्रति द्वेष रखने वाला व्यक्ति अपने आध्यात्मिक लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकता। साधना का मार्ग आत्मकल्याण का मार्ग है।
पहले समझें, फिर करें
पट्टाचार्य श्री ने कहा कि जीवन के रहस्यों को समझे बिना व्यर्थ श्रम नहीं करना चाहिए। किसी भी कार्य को करने से पहले विचार करना आवश्यक है। विचारों में विकार आते ही जीवन की दिशा बिगड़ने लगती है, इसलिए विचारों की पवित्रता बनाए रखना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि जब तक विचार पवित्र नहीं होंगे, तब तक कार्य भी पवित्र नहीं हो सकता। बुराई को छोड़े बिना अच्छाई के मार्ग में सच्चा प्रवेश संभव नहीं है।
दुर्लभ मानव जीवन का सदुपयोग करें
गुरुदेव ने कहा कि मनुष्य जीवन अत्यंत दुर्लभ है। इसका प्रत्येक क्षण अनमोल है, इसलिए जीवन को व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए। हर पल का उपयोग आत्मोन्नति और सदाचरण में करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि धन जीवन की आवश्यकताओं के लिए उपयोगी है, किंतु धन ही सर्वस्व नहीं है। वास्तविक सुख का आधार धर्म और सदाचरण है।
विवेकपूर्ण आचरण का संदेश
पट्टाचार्य श्री ने कहा कि जीवन में सत्य को जानना और उसके अनुरूप आचरण करना आवश्यक है। चलने से पहले मार्ग का निर्णय करें, भोजन से पहले उसका शोधन करें और बोलने से पहले विचार करें। इसी सजगता से व्यक्ति अपने जीवन को सही दिशा दे सकता है।
पूरी न्यूज का सार 5 पॉइंट में
- पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागरजी ने संयम मार्ग के लिए राग-द्वेष त्यागने का संदेश दिया।
- साधना को आत्मकल्याण का मार्ग बताया गया।
- कार्य से पहले विचार और विचारों की पवित्रता पर जोर दिया गया।
- मानव जीवन के प्रत्येक क्षण का सदुपयोग करने की प्रेरणा दी गई।
- सत्याचरण, विवेक और धर्म को जीवन का सही आधार बताया गया।
श्रीफल साथी : अभिषेक अशोक पाटील, कोल्हापुर




