देहरा तिजारा। दशलक्षण महापर्व के आठवें दिन चंद्र तीर्थ मंडपम् में उत्तम त्याग धर्म की श्रद्धा एवं भक्तिभाव के साथ आराधना की गई। दिगंबराचार्य भावलिंगी संत श्री विमर्शसागरजी महामुनिराज ने धर्मसभा में त्याग धर्म की महिमा बताते हुए कहा कि मनुष्य वस्तुओं का संग्रह करता जाता है, किंतु आत्मकल्याण का मार्ग संग्रह से नहीं, त्याग से प्रशस्त होता है।

त्याग वस्तुओं का नहीं, आसक्ति का हो

आचार्यश्री ने कहा कि त्याग का अर्थ केवल धन-संपत्ति अथवा वस्तुओं को छोड़ देना नहीं है। वास्तविक त्याग मन में उत्पन्न लोभ, मोह, ममता, अहंकार और आसक्ति को छोड़ने का नाम है।

उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति परिग्रह की सीमा को समझकर आवश्यकतानुसार जीवन जीता है और अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान-परोपकार करता है, तभी त्याग धर्म का वास्तविक स्वरूप उसके जीवन में उतरता है।

छोटी आदतों से शुरू करें त्याग की साधना

आचार्यश्री ने कहा कि जिस वस्तु को व्यक्ति अपना समझकर बांधकर रखता है, वही उसके भीतर आसक्ति का कारण बन जाती है। त्याग हमें केवल वस्तुओं से नहीं, बल्कि वस्तुओं के प्रति बनी आसक्ति से मुक्त होने की प्रेरणा देता है। यही भावना जीवन में करुणा, संतोष और आत्मसंयम को जन्म देती है।

उन्होंने श्रद्धालुओं से अनावश्यक वस्तुओं का संग्रह छोड़ने, भोजन में संयम रखने, समय का सदुपयोग करने, दूसरों के हित में अपनी सुविधाओं का त्याग करने और लोभ से दूर रहने की प्रेरणा दी।

श्रद्धालुओं ने भगवान का अभिषेक, शांतिधारा, पूजन एवं धर्माराधना कर उत्तम त्याग धर्म को जीवन में उतारने का संकल्प लिया।

कार्यक्रम में सहभागिता

मंदिर अध्यक्ष मुकेश जैन, महामंत्री नरेंद्र जैन, कोषाध्यक्ष शिंभू जैन, प्रचार मंत्री उमंग जैन, चातुर्मास अध्यक्ष सुरेश जैन, अमन जैन, शैलू जैन, टोनी जैन, पिंटा जैन, राकेश जैन एवं मिंकू जैन सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।

श्रीफल साथी : सोनल जैन