देहरा तिजारा। श्री चंद्रप्रभु दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र देहरा तिजारा में चल रहे 31वें चातुर्मास के अंतर्गत चंद्र तीर्थ मंडपम् में आयोजित धर्मसभा में परम पूज्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी महाराज ने व्रत, नियम, संयम और अनासक्ति के महत्व पर प्रकाश डालते हुए श्रद्धालुओं को आत्मकल्याण का मार्ग बताया।

आसक्ति ही दुख का प्रमुख कारण

आचार्यश्री ने कहा कि सभी संसारी जीवों के दुख का प्रमुख कारण आसक्ति है। आसक्ति ही जीव के भीतर इच्छाओं को जन्म देती है। यदि आसक्ति का क्षय होने लगे तो इच्छाओं का जन्म भी धीरे-धीरे कम होता जाता है। इसी कारण भगवान तीर्थंकर देव ने निर्ग्रंथ मुनिराजों को अनासक्ति योगी बनने का उपदेश दिया।

व्रत, नियम और संयम अपनाएं

आचार्यश्री ने कहा कि दिगंबर जैन श्रमण अनासक्ति योग की साधना करते हुए स्वयं के साथ-साथ सभी जीवों को भी यह मार्ग बताते हैं कि जीवन में आसक्ति को किस प्रकार कम किया जा सकता है। उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रेरणा देते हुए कहा कि व्रत लें, नियम लें और संयम अपनाएं, लेकिन सबसे पहले अपने भीतर की आसक्ति को कम करने का पुरुषार्थ करें।

आत्मा के हितकारी हैं व्रत और संयम

आचार्यश्री ने समझाया कि व्रत, नियम और संयम आत्मा के हितकारी इसलिए हैं, क्योंकि ये जीव को धीरे-धीरे आसक्ति से दूर ले जाते हैं। जिस जीवन में व्रत, नियम और संयम का अभाव रहता है, वह जीव विषयों एवं इच्छाओं के प्रति अधिक आसक्त बना रहता है।

उन्होंने कहा कि कभी-कभी कोई व्यक्ति बाहरी रूप से संतोषी दिखाई दे सकता है, लेकिन वास्तविक संतोष तभी सार्थक है जब अंतरंग में इच्छाओं और आसक्ति का क्षय हो। आत्मकल्याण के लिए बाहरी त्याग के साथ भीतर की आसक्ति को छोड़ने का अभ्यास भी आवश्यक है।

आत्मकल्याण की मिली प्रेरणा

धर्मसभा में श्रद्धालुओं ने आचार्यश्री के आध्यात्मिक मार्गदर्शन को शांतिपूर्वक सुना। प्रवचन के माध्यम से श्रद्धालुओं को व्रत, नियम एवं संयम के माध्यम से आसक्ति को कम करने और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली।

समाजजनों की रही सहभागिता

मंदिर अध्यक्ष मुकेश जैन एवं प्रचार मंत्री उमंग जैन ने बताया कि धर्मसभा में मंदिर अध्यक्ष मुकेश जैन, महामंत्री नरेंद्र जैन, कोषाध्यक्ष शिंभू जैन, प्रचार मंत्री उमंग जैन, चातुर्मास अध्यक्ष सुरेश जैन, सुरेंद्र जैन, वरुण जैन, रवि जैन, अंशुल जैन, अंकित जैन, सोनू जैन एवं नीरज जैन सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।

चातुर्मास में धर्म साधना का क्रम

31वें चातुर्मास के दौरान आयोजित धर्मसभाओं में श्रद्धालुओं को धर्म, संयम, व्रत, नियम, आत्मचिंतन एवं आत्मकल्याण की दिशा में प्रेरित किया जा रहा है। आचार्यश्री के मार्गदर्शन से श्रद्धालु बाहरी त्याग के साथ अंतरंग आसक्ति को कम करने के अभ्यास की प्रेरणा प्राप्त कर रहे हैं।