दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की अठारहवीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख...
"सरवर, तरुवर, संत जन, चौथा नेह।  परमार्थ के कारने, चारों धरी देह।।"

कबीरदास जी का यह दोहा जीवन के एक गहरे और सार्वकालिक संदेश को व्यक्त करता है। वे हमें बताते हैं कि वास्तविक सुख, शांति और संतोष निःस्वार्थ सेवा, त्याग और प्रेम में निहित है। जैसे जलाशय, वृक्ष, संत और प्रेम, इन चारों का अस्तित्व दूसरों की भलाई के लिए है, वैसे ही हमें भी अपने जीवन को परमार्थ के लिए समर्पित करना चाहिए।

वृक्ष अपने फल, फूल और छांव से दूसरों की सेवा करता है, जलाशय जल प्रदान करता है, संत जन मानवता की सेवा करते हैं, और प्रेम बिना किसी स्वार्थ के सभी को अपना बनाता है। इन चारों का जीवन हमें यह सिखाता है कि परमार्थ, यानी दूसरों की भलाई और सेवा, ही जीवन का सर्वोत्तम उद्देश्य है।

कबीरदास जी के इस दोहे से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमारी जीवन यात्रा तभी सार्थक होती है जब हम अपने आत्मकल्याण को छोड़कर समाज और अन्य लोगों की सेवा में अपने समय और ऊर्जा का योगदान करते हैं। इसलिए, हमें भी अपने जीवन को निःस्वार्थ सेवा, त्याग और प्रेम से भरपूर बनाना चाहिए, क्योंकि यही जीवन का असली उद्देश्य है।