कुण्डलपुर(दमोह)। जैन धर्म का सर्वाेपरि पर्व दशलक्षण महापर्व श्री सिद्धक्षेत्र में पूज्य बड़े बाबा भगवान आदिनाथ जी के चरण सानिध्य में श्रद्धा-भक्ति के साथ मनाया जाएगा। महासमाधि धारक आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज एवं आचार्य श्री समयसागर जी महाराज के मंगल आशीर्वाद से निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज, मुनि श्री पवित्रसागर जी महाराज, ऐलक श्री निश्चय सागर, ऐलक श्री निजानंद सागर, ऐलक श्री चैत्य सागरजी महाराज आदि संघ के सानिध्य में होने वाले इस महापर्व के लिए देशभर से श्रद्धालुओं के पहुंचने का क्रम शुरू हो गया है। राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं क्षेत्रीय प्रचार मंत्री जय कुमार जैन ‘जलज’ ने बताया कि पर्व 16 सितंबर से प्रारंभ होकर 25 सितंबर अनंत चतुर्दशी को संपन्न होगा। 27 सितंम्वर को विश्वमैत्री क्षमावाणी महापर्व मनाया जाएगा। इस अवसर पर निर्यापक मुनि श्री समतासागर महाराज ने कहा कि दशलक्षण पर्व मानव-मूल्यों की पूजा का शाश्वत पर्व है, जो मनुष्य को दुःखों के गर्त से निकालकर सुख और आत्मकल्याण के शिखर की ओर ले जाता है। उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य रूपी दस धर्म जीवन को शुद्ध और अनुशासित बनाने का संदेश देते हैं।
उत्तम सत्य का अर्थ केवल सच बोलना नहीं
उन्होंने कहा कि उत्तम क्षमा कायरों का नहीं, वीरों का भूषण है। समर्थ होते हुए भी प्रतिकार न करना सच्ची क्षमा है। फल-फूलों से लदा पेड़ जिस प्रकार झुक जाता है, उसी प्रकार गुणी आत्मा विनम्र होती हैकृयही उत्तम मार्दव है। उत्तम आर्जव जीवन में सरलता की प्रेरणा देता है। जैसे सर्प को बिल में जाने के लिए सीधा होना पड़ता है, वैसे ही आत्मगृह में प्रवेश के लिए मनुष्य को सरल बनना होगा। मुनिश्री ने कहा कि लोभ से तृष्णा बढ़ती है, जबकि संतोष रूपी जल आत्मा को पवित्र करता है। यही उत्तम शौच का संदेश है। उत्तम सत्य का अर्थ केवल सच बोलना नहीं, बल्कि सत्य को हित, मित और प्रिय रूप में कहना है। उत्तम संयम जीवन को अनुशासन देता है। बिना ब्रेक की साइकिल जिस प्रकार दुर्घटना का कारण बन सकती है, उसी प्रकार संयमहीन जीवन भी पतन की ओर ले जाता है।
सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान सम्यक चारित्र मोक्ष का मार्ग
उत्तम तप की महत्ता बताते हुए उन्होंने कहा कि दूध को तपाए बिना घी नहीं मिलता, उसी प्रकार आत्मा को तपाए बिना सिद्धत्व की प्राप्ति नहीं हो सकती। उत्तम त्याग राग के दलदल से बाहर निकालने का सहारा है। उत्तम आकिंचन्य भीतर से खाली होने की साधना हैकृजो जितना खाली होता है, उतना ही ऊंचा उठता है। उत्तम ब्रह्मचर्य का वास्तविक अर्थ आत्मा में रमण करना है। तत्त्वार्थ सूत्र के प्रथम सूत्र “सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः” का उल्लेख करते हुए मुनि श्री ने कहा कि सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र ही मोक्ष का मार्ग हैं। यह सूत्र आध्यात्मिक मुक्ति के साथ व्यवहारिक जीवन को भी सही दिशा देता है। पहले यह समझना जरूरी है कि वास्तविक क्या है और भ्रम क्या है। आज की भाषा में कहें तो कई बार हम रील को रियल और रियल को रील समझने की भूल कर बैठते हैं। यही सम्यक दर्शन और मिथ्या दर्शन का अंतर है।
दशलक्षण पर्व आत्मचिंतन, संयम और जीवन परिवर्तन का अवसर
उन्होंने कहा कि सही दृष्टि के बाद सही और पूर्ण जानकारी जरूरी है। केवल जानकारी प्राप्त कर लेना पर्याप्त नहीं, उसे ठीक प्रकार से समझना भी आवश्यक है। सही ज्ञान के आधार पर निर्णय लेने के बाद उस पर टिके रहने की नैतिकता और जिम्मेदारी समझना ही सम्यक चारित्र का व्यावहारिक स्वरूप है। संस्कार शिविरार्थियों से मुनिश्री ने कहा कि दशलक्षण पर्व आत्मचिंतन, संयम और जीवन परिवर्तन का अवसर है। बड़े पुण्ययोग से बड़े बाबा के दरबार में दस दिनों तक धर्म साधना करने का अवसर मिला है। इसलिए यहां घर जैसी आपाधापी, आगे निकलने की होड़, लड़ाई-झगड़ा अथवा व्यवस्था को लेकर अधीरता नहीं होनी चाहिए। परिणामों को शांत रखते हुए विचारों में स्थिरता, जीवन में संयम और मन में भक्ति का भाव रखें। उन्होंने कहा कि शिविर की व्यवस्थाएं पंजीयन और निर्धारित क्रम के अनुसार सभी को मिलेंगी। देर से आने वाले श्रद्धालु धैर्य रखें और व्यवस्था में सहयोग करें। व्यवस्था कैसी मिली, इस पर असंतोष करने के बजाय इस बात का आभार मानें कि बड़े बाबा के चरणों में दशलक्षण महापर्व मनाने का अवसर मिला है।
दस दिन प्रयोग और शिक्षा के रूप में मिलते हैं
उन्होंने सेवा में लगे कार्यकर्ताओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की अपील भी की। शिविर की दिनचर्या सुबह से धर्मसाधना के साथ शुरू होगी। तत्त्वार्थ सूत्र का पाठ, पूजन, सामायिक, प्रतिक्रमण, धर्म की माला और जाप सहित विभिन्न धार्मिक गतिविधियों के माध्यम से श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन का अवसर मिलेगा। मुनिश्री ने कहा कि पर्व का वास्तविक लाभ तभी है, जब दस दिनों की साधना हमारे व्यवहार और जीवन में परिवर्तन लाए। मुनि श्री ने कहा कि दशलक्षण के ये दस दिन प्रयोग और शिक्षा के रूप में मिलते हैं, जिनके संस्कार जीवनभर साथ चलते हैं। कुण्डलपुर में धर्म, ज्ञान, संयम और भक्ति की त्रिवेणी उपलब्ध है। प्रत्येक श्रद्धालु को इसका लाभ लेकर दसों धर्मों को अपने आचरण में उतारना चाहिए। स्वयं आनंदित रहना और अपने आचरण से दूसरों को आनंद देना ही दशलक्षण पर्व की साधना को सार्थक करता है।





