कुण्डलपुर (म.प्र.)। दशलक्षण महापर्व केवल पूजा-पाठ, अभिषेक, उपवास और धार्मिक क्रियाओं तक सीमित रहने का पर्व नहीं, बल्कि स्वयं को देखने, समझने और बदलने का अवसर है। इन दस दिनों में साधक बाहरी संसार से दृष्टि हटाकर अपनी आत्मा का अवलोकन करें, अपने दोषों का आलोचन करें, आत्मशुद्धि का पुरुषार्थ करें और आत्मोपलब्धि की दिशा में आगे बढ़ें। दशलक्षण की साधना का वास्तविक सार इसी भीतर की यात्रा में है।
यह बात निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने कुण्डलपुर सिद्धक्षेत्र में 16 से 25 सितंबर तक आयोजित होने वाले दस दिवसीय संस्कार शिविर के संदेश में कही।
स्वयं से पूछें—मैं कौन हूं, मेरा वास्तविक स्वरूप क्या है?
मुनि श्री ने कहा कि इन दस दिनों में प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं से पूछना चाहिए—मैं कौन हूं? मेरा वास्तविक स्वरूप क्या है? मेरे जीवन में कौन-से दोष मेरी आत्मिक प्रगति में बाधक बने हुए हैं?
उन्होंने कहा कि आत्मा का अवलोकन केवल अपने बारे में विचार करना नहीं है, बल्कि अपने भीतर उठने वाले भावों को निष्पक्ष दृष्टि से देखने का अभ्यास है।
आत्मावलोकन से आत्मोपलब्धि तक चार चरण
मुनि श्री ने दशलक्षण की साधना को चार महत्वपूर्ण चरणों से जोड़ते हुए कहा कि आत्मा का अवलोकन अपने भावों को देखने का अभ्यास है। आत्मा का आलोचन अपने दोषों को स्वीकार करने का साहस है। आत्मा की शुद्धि उन दोषों को दूर करने का पुरुषार्थ है और आत्मोपलब्धि उस साधना की परिणति है, जिसमें व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप की अनुभूति की ओर बढ़ता है।
दशलक्षण महापर्व इन चारों चरणों को अपने जीवन में उतारने का अवसर प्रदान करता है।
बड़े बाबा की भूमि दे रही साधना की प्रेरणा
मुनि श्री समतासागर जी ने कहा कि बड़े बाबा की पावन भूमि कुण्डलपुर स्वयं साधना और आध्यात्मिक चेतना की प्रेरणा देती है। दशलक्षण के दौरान संतों का सान्निध्य और गुरुओं का मार्गदर्शन श्रद्धालुओं के लिए विशेष अवसर है।
गुरुदेव आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज का परोक्ष आशीर्वाद, आचार्य श्री समयसागर जी महाराज का प्रत्यक्ष आशीर्वाद एवं मार्गदर्शन और बड़े बाबा की पावन छत्रछाया संस्कार शिविर को विशेष आध्यात्मिक वातावरण प्रदान कर रही है।
एक सकारात्मक परिवर्तन का संकल्प लेकर लौटें शिविरार्थी
मुनि श्री ने कहा कि संस्कार शिविर का उद्देश्य दस दिनों तक धार्मिक वातावरण में रहना मात्र नहीं है। शिविरार्थी यहां से ऐसे संस्कार लेकर लौटें, जो उनके पूरे जीवन की दिशा बदल सकें।
धर्म तभी सार्थक है, जब वह जीवन में संयम, विनय, करुणा, आत्मनियंत्रण और विवेक पैदा करे। प्रत्येक शिविरार्थी को इन दस दिनों में अपने जीवन में कम से कम एक सकारात्मक परिवर्तन का संकल्प लेकर लौटना चाहिए।
‘दशलक्षण आत्मकल्याण की प्रयोगशाला’
मुनि श्री ने दशलक्षण पर्व को आत्मकल्याण की प्रयोगशाला बताते हुए कहा कि यह भीतर के दोषों को पहचानने और उन्हें दूर करने के अभ्यास का अवसर है।
उन्होंने कहा कि पर्व समाप्त होने के बाद यदि हमारे व्यवहार, विचार और दृष्टि में कोई परिवर्तन दिखाई नहीं देता तो हमें अपनी साधना की सार्थकता पर विचार करना चाहिए। पर्व का वास्तविक प्रभाव वही है, जो हमारे जीवन में दिखाई दे।
दस दिनों का कैलेंडर नहीं, आत्मा की ओर लौटने का निमंत्रण
मुनि श्री पवित्रसागर जी महाराज ने कहा कि दशलक्षण महापर्व केवल दस दिनों का कैलेंडर नहीं, बल्कि आत्मा की ओर लौटने का निमंत्रण है।
इस बार पर्व में केवल कुछ करना ही लक्ष्य न हो, बल्कि अपने भीतर देखना, दोषों को पहचानना, विकारों को छोड़ना और स्वयं को बेहतर बनाने का प्रयास करना चाहिए। बड़े बाबा की पावन छत्रछाया और गुरुओं के मार्गदर्शन में संस्कार शिविर भक्ति के साथ ज्ञान और ज्ञान के साथ संयम की साधना का अवसर बनेगा।
साधना ने जीवन को कितना बदला, इससे करें मूल्यांकन
ऐलक निश्चयसागर जी महाराज ने कहा कि दशलक्षण की साधना का मूल्यांकन इस बात से होना चाहिए कि उसने हमारे जीवन को कितना बदला।
हमें देखना होगा कि हम केवल बाहरी क्रियाओं में व्यस्त रहे या अपने भीतर के राग-द्वेष, कषाय और कमजोरियों को पहचानकर उन्हें दूर करने का प्रयास भी किया। संसार में व्यक्ति बहुत कुछ देखने और पाने में लगा रहता है, लेकिन स्वयं को देखने के लिए समय नहीं निकाल पाता। दशलक्षण पर्व इसी भूल को सुधारकर जीवन की दिशा भीतर की ओर मोड़ने का अवसर है।
देशभर से कुण्डलपुर पहुंचे करीब 1200 शिविरार्थी
राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी एवं प्रचार मंत्री जयकुमार जैन जलज ने बताया कि 16 सितंबर से 25 सितंबर तक कुण्डलपुर सिद्धक्षेत्र में आयोजित संस्कार शिविर में श्रद्धालुओं को प्रातः 5 बजे से रात्रि 8:30 बजे तक आध्यात्मिक गतिविधियों, धार्मिक अनुष्ठानों, अध्ययन और संतों के सान्निध्य का लाभ मिलेगा।
भारत के विभिन्न नगरों से करीब 1200 श्रावक-श्राविकाएं कुण्डलपुर पहुंच चुके हैं। कुण्डलपुर तीर्थक्षेत्र कमेटी की ओर से शिविरार्थियों के लिए आवास एवं शुद्ध भोजन सहित आवश्यक व्यवस्थाएं की गई हैं।
पर्व मनाएं ही नहीं, उसके संदेश को जीवन में उतारें
बड़े बाबा की पावन भूमि में दस दिनों तक चलने वाला संस्कार शिविर श्रद्धालुओं को केवल दशलक्षण पर्व मनाने का नहीं, बल्कि उसके संदेश को जीवन में उतारने का अवसर देगा। इन दस दिनों में बाहर की दुनिया से कुछ समय के लिए दृष्टि हटाकर भीतर की दुनिया को जानना ही महापर्व की सबसे बड़ी साधना बनेगा।





